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मेरे घर आना ज़िंदगी - 20
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (20) इन दिनों कविता के प्रति रुझान तेजी से हो रहा था। कहानी दिमाग में आती ही नहीं थी। सुबह घूमने जाती ...

नरोत्तमदास पाण्डेय मधु जी का जीवन और व्यक्तित्व
by कृष्ण विहारी लाल पांडेय
  • 45

ऽ नरोत्तमदास पाण्डेय मधु जी का जीवन और व्यक्तित्व नरोत्तमदास पाण्डेय ’’मधु’’ बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बुन्देलखण्ड के ऐसे कृती कवि हुए हैं जिन्होंने प्रभूत परिमाण में उत्कृष्ट ...

पके फलों का बाग़ - 6
by Prabodh Kumar Govil
  • 186

आने वाला फ़ोन मेरे एक मित्र का था जो इसी शहर में एक बड़ा डॉक्टर था। उसने कहा कि उसे अपने एक क्लीनिक के लिए एक छोटे लड़के की ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 19
by Santosh Srivastav
  • 81

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (19) इतनी लंबी साहित्यिक यात्राओं के बाद मुझे काफी समय खुश रहना चाहिए था पर मेले की समाप्ति का सूनापन मेरे साथ ...

पके फलों का बाग़ - 5
by Prabodh Kumar Govil
  • 282

मुझे अपने जीवन के कुछ ऐसे मित्र भी याद आते थे जो थोड़े- थोड़े अंतराल पर लगातार मुझसे फ़ोन पर संपर्क तो रखते थे किन्तु उनका फ़ोन हमेशा उनके ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 18
by Santosh Srivastav
  • 123

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (18) दिल्ली में मौलिक काव्य सृजन द्वारा कृष्ण काव्य सम्मान 20 अक्टूबर को मिलना था । कार्यक्रम के आयोजक सागर सुमन ने ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 17
by Santosh Srivastav
  • 111

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (17) सूने घर का पाहुना ज्यूँ आया त्यूँ जाव औरंगाबाद पहुंचकर प्रमिला से लिपट खूब रोई । सब कुछ खत्म । हेमंत...... ...

पके फलों का बाग़ - 4
by Prabodh Kumar Govil
  • 507

मुझे रशिया देखने का चाव भी बहुत बचपन से ही था। इसका क्या कारण रहा होगा, ये तो मैं नहीं कह सकता पर मेरे मन में बर्फ़ से ढके ...

पके फलों का बाग़ - 3
by Prabodh Kumar Govil
  • 444

क्या मैं दोस्तों की बात भी करूं? एक ज़माना था कि आपके दोस्त आपकी अटेस्टेड प्रतिलिपियां हुआ करते थे। उन्हें अटेस्ट आपके अभिभावक करते थे। वो एक प्रकार से ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 16
by Santosh Srivastav
  • 216

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (16) किसी से मिलना बातें करना, बातें करना अच्छा लगता है। लेकिन ज़िंदगी इतनी आसान कहाँ! वह तो वीराने में फैला हुआ ...

पके फलों का बाग़ - 2
by Prabodh Kumar Govil
  • 402

लो, इधर तो मैं फ़िर से अपने गुज़रे हुए बचपन में लौट रहा था, उधर मेरे इस यज्ञ में घर के लोग भी आहूति देने लगे। मुझे मेरी बेटी ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 15
by Santosh Srivastav
  • 252

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (15) जब राजस्थानी सेवा संघ की स्वर्ण जयंती भाईदास हॉल में मनाई जा रही थी तब माया गोविंद और गोविंद जी से ...

पके फलों का बाग़ - 1
by Prabodh Kumar Govil
  • 660

बाग़ के फल अब पकने लगे थे। लेकिन माली भी बूढ़ा होने लगा। माली तो अब भी मज़े में था, क्योंकि बूढ़ा होने की घटना कोई एक अकेले उसी ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 14
by Santosh Srivastav
  • 288

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (14) इसी वर्ष नमन प्रकाशन ने सुरेंद्र तिवारी के संपादन में 20वीं सदी की महिला कथाकारों की 10 खंडों में कहानियां छापी। ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 13
by Santosh Srivastav
  • 351

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (13) थक चुकी थी। चाहती थी किसी शांत पहाड़ी जगह जाकर गर्मियां बिताऊँ। अपने अधूरे पड़े उपन्यास "लौट आओ दीपशिखा" को भी ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 12
by Santosh Srivastav
  • 267

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (12) आलोक भट्टाचार्य नवोदित लेखिका सुमीता केशवा की किताब एक पहल ऐसी भी का लोकार्पण हेमंत फाउंडेशन के बैनर तले कराना चाहते ...

तेरे शहर के मेरे लोग - 19 - अंतिम भाग
by Prabodh Kumar Govil
  • 771

( उन्नीस - अंतिम भाग) मेरे पिता मेरे साथ बस मेरी पच्चीस वर्ष तक की आयु तक रहे, फ़िर दुनिया छोड़ गए। मेरी मां मेरे साथ मेरी तिरेसठ वर्ष ...

तिरुपति बालाजी का वो यादगार प्रवास
by Keyur Shah
  • 627

नमस्कार मित्रों,मेरे जीवन में अब तक बहुत सारे अनुभव हुए हैं, जिन्हें याद करके मन रोमांचित हो जाता है, मैं इन अनुभवों को आपके साथ साझा करने का विचार ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 11
by Santosh Srivastav
  • 432

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (11) हेमंत की मृत्यु के बाद मेरी बर्बादी के ग्रह उदय हो चुके थे । मीरा रोड का घर हेमंत के बिना ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 10
by Santosh Srivastav
  • 345

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (10) चर्चगेट स्थित इंडियन मर्चेंट चेंबर का सभागार बुक कर लिया । शैलेंद्र सागर, विभूति नारायण राय, काशीनाथ सिंह, भारत भारद्वाज सब ...

तेरे शहर के मेरे लोग - 18
by Prabodh Kumar Govil
  • 714

( 18 )मैंने देखा था कि जब लोग नौकरी से रिटायर होते हैं तो इस अवसर को किसी जश्न की तरह मनाते हैं। ये उनकी ज़िंदगी के जीविकोपार्जन के ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 9
by Santosh Srivastav
  • 420

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (9) विरार के फ्लैट का लोन पटाने में दिक्कतें आ रही थीं इसलिए हमने मीरा रोड सृष्टि कॉन्प्लेक्स में निर्मल टॉवर की ...

तेरे शहर के मेरे लोग - 17
by Prabodh Kumar Govil
  • 654

( सत्रह )हैदराबाद में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया। मैं विमान यात्रा से वहां पहुंचा। किन्तु जब विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस जा रहा था तभी मेरे मेज़बान के पास ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 8
by Santosh Srivastav
  • 510

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (8) समय बीतता गया। एक दिन अचानक श्रीकांत जी (बाबा नागार्जुन के पुत्र जो अब यात्री प्रकाशन संभालते हैं) का फोन आया ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 7
by Santosh Srivastav
  • 1.8k

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (7) मेरे लिए मेरे जीवन में आया एक एक व्यक्ति भविष्य के लिए मेरी आँखें खोलता गया फिर चाहे आँखें उससे मिले ...

तेरे शहर के मेरे लोग - 16
by Prabodh Kumar Govil
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( सोलह )सोशल मीडिया पर अब मेरी सक्रियता कुछ बढ़ने लगी थी। दुनिया के मेले में कई लोग आपकी निगाहों के सामने आते थे, आपके दायरे में आते थे, आपके ...

आलेख - 102 नॉट आउट
by S Sinha
  • 315

      आलेख - 102 नॉट आउट    हमारे यहाँ कुछ दिनों पहले एक फिल्म आयी थी 102 नॉट आउट  . इस फिल्म में बॉलीवुड के दो महान ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 6
by Santosh Srivastav
  • 486

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (6) धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय.......... बताया गया था कि हवाई यात्रा 35 मिनट की होगी। उन 35 मिनटों ...

तेरे शहर के मेरे लोग - 15
by Prabodh Kumar Govil
  • 687

( पंद्रह )कुछ समय पूर्व मैंने अपने पुत्र की सगाई का ज़िक्र किया था। तो आपको अपनी बहू, यानी उसकी होने वाली पत्नी के बारे में भी बता दूं, कि ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 5
by Santosh Srivastav
  • 530

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (5) गहरे पानी पैठ उम्र की बही पर सोलहवें साल ने अंगूठा लगाया । वह उम्र थी बसन्त को जीने की, तारों ...