वरदान - 6

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बड़ी रानी जो अब अस्थायी रूप से राजसिंहासन पर बैठी थी, उसके मन में एक गहरी चिंता घर कर गई थी। उसे भय सताने लगा कि जैसे ही राजकुमार राजवर्धन बड़ा होगा, प्रजा और राजा के वफ़ादार मंत्री उसे राजा घोषित कर देंगे। तब उसके हाथ से सारी सत्ता छिन जाएगी।इस भय ने ही उसे और भी निर्दयी और चालाक बना दिया। उसने सबसे पहले अपने रिश्तेदारों और भाइयों को दरबार के बड़े पदों पर बैठा दिया—कोई सेनापति बन गया, कोई कोषाध्यक्ष, तो कोई न्यायमंत्री। इस तरह महल और राज्य की बागडोर धीरे-धीरे उसके परिवार के हाथों में पहुँचने लगी।जो