अन्दर से विश्वास उत्पन्न करो

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ऋगुवेद  सूक्ति-- (64)की व्याख्या "विश्वासं धेहि"ऋगुवेद --10/48/5भावार्थ --मन में विश्वास स्थापित करो। ऋग्वेद 10/48/5 — पूरा मंत्रमंत्र (संस्कृत):विश्वासं धेहि मे मनो यथा त्वं मघवन्नश्विना।नहि त्वदन्यो गिर्वणो गिरः सघत्ते सहो मम॥ शब्दार्थविश्वासं धेहि = विश्वास स्थापित करोमे मनः = मेरे मन मेंयथा = जैसेत्वं मघवन् = हे इन्द्र (दानशील देव)अश्विना = अश्विनीकुमार (चिकित्सक देवता)नहि = नहींत्वत् अन्यः = तुमसे अन्य कोईगिर्वणः = स्तुति करने योग्य देवगिरः = वाणी/प्रार्थनासघत्ते = स्वीकार करता / जोड़ता हैसहः मम = मेरी शक्ति/सामर्थ्य के साथ भावार्थ (सरल हिंदी में)हे इन्द्र और अश्विनीकुमारों! मेरे मन में दृढ़ विश्वास स्थापित करो।क्योंकि तुमसे बढ़कर कोई भी देवता मेरी प्रार्थनाओं को स्वीकार करने वाला