ऋगुवेद सूक्ति-- (65) की व्याख्या "उत्सं दुहन्ति"ऋगुवेद --9/112/1भावार्थ --अन्दर से उत्साह उत्पन्न करो। उत्सं दुहन्ति” (ऋग्वेद 9.112.1)इसका अर्थ समझने के लिए शब्दों और प्रसंग दोनों को देखना ज़रूरी है। पदच्छेद व अर्थउत्सं = स्रोत, झरना, ऊर्जा का मूल (आंतरिक शक्ति/प्रेरणा का स्रोत)दुहन्ति = दुहना, निकालना, प्राप्त करना शाब्दिक अर्थ:“(वे) स्रोत से दुहते हैं”अर्थात् मूल स्रोत से ऊर्जा/बल/रस को निकालते हैं। भावार्थ (सरल भाषा में)दिया हुआ भावार्थ—“अन्दंर से उत्साह उत्पन्न करो”—आंशिक रूप से सही है, लेकिन थोड़ा और गहराई से देखें तो: यह मंत्र संकेत देता है किमनुष्य अपने भीतर के स्रोत (उत्स, ऊर्जा, प्रेरणा) से शक्ति निकालकर जीवन में उत्साह और कर्मशीलता उत्पन्न करे। गूढ़ आध्यात्मिक अर्थऋग्वेद