दोहा: ३ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय॥कथा: "कड़वी ज़ुबान का ज़हर"एक नगर में एक धनी व्यापारी रहता था। वह दान-पुण्य बहुत करता था, लेकिन उसकी ज़ुबान बहुत कड़वी थी। वह अपने नौकरों और परिवार वालों से हमेशा चिल्लाकर और अपमानजनक तरीके से बात करता था। उसे लगता था कि चूंकि वह पैसा दे रहा है, तो उसे कुछ भी बोलने का हक है।एक दिन एक संत उसके द्वार पर आए। व्यापारी ने उन्हें भी झिड़क दिया। संत मुस्कुराए और बोले, "बेटा, तुम महल में तो रहते हो, लेकिन तुम्हारे शब्द कांटे की तरह