अहंकार का पोस्टमार्टम - भाग 7

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दोहा:१३अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥कथा: "संतुलन की डोर"एक वीणा वादक था जो अपनी वीणा के तारों को कस रहा था। उसने सोचा कि तार जितने ज़्यादा कसे हुए होंगे, संगीत उतना ही ऊँचा और सुरीला निकलेगा। उसने तार इतने ज़्यादा कस दिए कि जैसे ही उसने पहला सुर छेड़ा, तार टूट गया।फिर उसने नया तार लगाया और उसे बहुत ढीला छोड़ दिया। इस बार जब उसने बजाया, तो वीणा से कोई आवाज़ ही नहीं निकली, सिर्फ एक बेसुरा शोर हुआ।पास खड़े एक गुरु ने यह देखा