पवित्र प्रेम या अभिशाप ? - 4

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अगली सुबह…ऑफिस का माहौल सामान्य था…लोग अपने काम में लगे हुए थे…लेकिन हवा में एक अजीब भारीपन था। तभी मुख्य दरवाज़ा खुला…और अंदर आई सिद्धिका। आज वो पहले जैसी नहीं लग रही थी। उसने वही खूबसूरत रूप लिया हुआ था…लेकिन उसके चेहरे की मासूमियत कहीं खो गई थी। उसकी आँखों में ठंडापन था…और भीतर कुछ खतरनाक जाग चुका था। कई लोगों को अचानक घुटन होने लगी…कंप्यूटर स्क्रीन अपने आप झिलमिलाने लगीं…लाइट्स दो बार टिमटिमाईं…सब समझ गए— कुछ गलत है।कृष्णा अपनी सीट से उठा… जैसे ही उसकी नजर सिद्धिका पर पड़ी वो ठिठक गया।उसने मन ही मन कहा —ये वही नहीं