सस्सी–पुन्नू - 5

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शाम पूरी तरह ढल चुकी थी…आसमान अब गहरे नीले रंग में डूब गया था, और उसमें टिमटिमाते तारे ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने काली चादर पर छोटे-छोटे दीप जला दिए हों। हवा अब ठंडी हो गई थी, लेकिन उसमें एक अजीब-सी खामोशी थीऐसी खामोशी, जो सिर्फ बाहर नहीं, भीतर भी उतरती चली जाती है। सस्सी धीरे-धीरे घर की ओर लौट रही थी… उसके कदम हल्के थे, पर मन भारी। रेत पर चलते हुए उसके पैरों के निशान पीछे छूटते जा रहे थेजैसे हर कदम के साथ वो खुद को कहीं पीछे छोड़ती जा रही हो।घर के आँगन में