अकथ - भाग 1

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बस्ती की तंग गलियों में धूल उड़ रही थी। सूरज की तपिश कच्ची छतों को झुलसा रही थी, लेकिन सात के नील के पैरों में जैसे पहिए लगे थे।‎ माँ! मैं खेलने जा रहा हूँ, उसने माथे का पसीना पोंछते हुए चिल्लाकर कहा।‎‎उसकी माँ, जो फटे हुए कपड़ों के ढेर से कुछ काम का ढूँढ रही थी, रुकी और उसे गौर से देखा। उसकी आवाज़ में एक चेतावनी थी, जो हर गरीब माँ की सबसे बड़ी पूँजी होती है—स्वाभिमान।‎ जा, पर देख... ज्यादा बदमाशी मत करना। बस अपने खेल पर