दान देने से धन नहीं घटता

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ऋगुवेद सूक्त.(१७) की व्याख्या मन्त्र — ऋग्वेद १०/११७/१उतो रयिः पृणतो नो पदस्यति।भावार्थ -दान करने वाले का धन नहीं घटता। पदच्छेद--उत + उ + रयिः + पृणतः + नः + पदस्यति शब्दार्थउत = और, भीउ = निश्चय ही, वास्तव मेंरयिः = धन, सम्पत्तिपृणतः (पृणतो) = देने वाले का, दान करने वाले का (पृण् धातु = भरना, तृप्त करना, दान देना)नः / नो = नहींपदस्यति = घटता है, नष्ट होता है भावार्थ--निश्चय ही दान करने वाले का धन घटता नहीं है।अर्थात् जो व्यक्ति दूसरों को तृप्त करता है, दान देता है, उसका धन कम नहीं होता — बल्कि पुण्य और यश की वृद्धि होती है।वेदों में