ऋग्वेद सूक्ति-(4) की व्याख्या ऋगुवेद--10/191/2सं गच्छव्व सं वदध्वंभावार्थ--साथ-साथचलो, साथ ऋग्वेद 10.191.2 का मंत्र है:संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥शब्दार्थ:संगच्छध्वम् = साथ-साथ चलोसंवदध्वम् = साथ-साथ बोलो, परस्पर संवाद करोसं वो मनांसि जानताम् = तुम्हारे मन एक-दूसरे को समझें, एकमत होंदेवा भागं यथा पूर्वे = जैसे प्राचीन देवता अपने यज्ञ-भाग कोसंजानानाः उपासते = एकमत होकर ग्रहण करते थेभावार्थ:"एक साथ चलो, एक साथ बोलो, तुम्हारे मन परस्पर एक-दूसरे को समझें। जैसे प्राचीन देवता आपसी सहमति और एकता से अपने कर्तव्यों का पालन करते थे, वैसे ही तुम भी एकता और सद्भाव के साथ कार्य करो।"यह ऋग्वेद का अत्यंत प्रसिद्ध