परिश्रम का महत्व

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ऋग्वेद सूक्ति(3) की व्याख्या "न ऋते श्रान्तस्य सख्यायदेवा:"4/33/11भावार्थ -देवता(ईश्वर) श्रम करने वाले के सिवा और से मित्रता नहीं ‌करते।ऋग्वेद 4.33.11 का अंश:न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः"शब्दार्थन ऋते = बिना, सिवायश्रान्तस्य = परिश्रम करने वाले (यहाँ केवल थके हुए नहीं, बल्कि प्रयत्नशील व्यक्ति के अर्थ में)सख्याय = मित्रता के लिएदेवाः = देवताभावार्थदेवता (या ईश्वर) परिश्रमी, कर्मशील और प्रयत्न करने वाले मनुष्य के ही मित्र होते हैं; आलसी या अकर्मण्य व्यक्ति को उनका सहयोग प्राप्त नहीं ऋग्वेद 4.33.11इदाह्नः पीतिमुत वो मदं धुर्न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः ।ते नूनमस्मे ऋभवो वसूनि तृतीये अस्मिन्सवने दधात ॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थइदा अह्नः = आज के दिन / इस