वरदान - 10

राजकुमारी मंदिर से लौटकर महल पहुँची,पर वह अपने सुंदर कक्ष में नहीं गउसका मन भय, चिंता और उलझन से भरा हुआ था।इसलिए वह सीधे कोप-भवन में चली गई।उसने अपने आभूषण उतार दिए,मणियों का हार एक ओर रख दिया,और चुपचाप भूमि पर बैठ गई।उसके चेहरे की चमक फीकी पड़ चुकी थी।मंदिर में सुनी हुई वह दिव्य वाणी बार-बार उसके कानों में गूँज रही थी—“एक सौ एक मणियों की माला, झुमके और कंगन पहनकर आना…”राजकुमारी ने उसी क्षण भोजन और जल का त्याग कर दिया।उसने न कुछ खाया, न कुछ पिया।दासियाँ उसे बहुत समझाती रहीं—“राजकुमारी जी, कुछ तो ग्रहण कीजिए…”पर वह मौन