साझा कल्याण

ऋग्वेद सूक्ति-(२) की व्याख्या *केवलाघो भवति केवलादी"ऋग्वेद --1/117/4भावार्थ --जो अकेले भोग करता है वह‌ पाप का‌ भागी होता है। पूरा श्लोक अर्थ सहितजो मंत्र उद्धृत किया है — "केवलाघो भवति केवलादी" — यह ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र का अंश है।मूल मंत्र (ऋग्वेद 10.117.6)मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य।नार्यमाणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥पदच्छेदमोघम् अन्नम् विन्दते अप्रचेताःसत्यम् ब्रवीमिवधः इत् सः तस्यन अर्यमाणम् पुष्यतिनः सखायम्केवल-अघः भवति केवल-आदीभावार्थजो मनुष्य विवेकहीन होकर केवल अपने लिए धन और अन्न संग्रह करता है, उसका अन्न व्यर्थ जाता है। मैं सत्य कहता हूँ कि वह अपने ही विनाश का कारण बनता है। जो न मित्रों