आलस्य मत करो

ऋगुवेद सूक्ति (68) की व्ययाख्य "मां सेधत"ऋग्वेद --7/32/9भावार्थ --आलस्य मत कऱो।पूरा मंत्र  अर्थ ऋग्वेद 7.32.9 का मंत्र इस प्रकार है—मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे।तरणिरिज्जयति क्षेति पुष्यति न देवासः कवत्नवे॥ पदच्छेद एवं शब्दार्थमा स्रेधत = आलस्य मत करो, शिथिल मत पड़ो।सोमिनः = यज्ञ करने वाले, कर्मशील जन।दक्षता = दक्ष बनो, परिश्रम करो।महे = महान (ईश्वर/इन्द्र) के लिए।कृणुध्वम् = कर्म करो, प्रयत्न करो।राये = धन, समृद्धि के लिए।तरणिः = परिश्रमी, उद्यमी व्यक्ति।जयति = विजय प्राप्त करता है।क्षेति = सुखपूर्वक निवास करता है।पुष्यति = उन्नति करता है, फलता-फूलता है।न देवासः कवत्नवे = देव (श्रेष्ठ शक्तियाँ) आलसी या कर्तव्यहीन व्यक्ति का साथ नहीं