अभी नहीं...गाँव के किनारे एक विशाल पीपल का वृक्ष था। उसकी फैली हुई शाखाएँ दूर-दूर तक शीतल छाया बिखेरती थीं। पक्षियों का कलरव, पत्तों की सरसराहट और उसके नीचे पसरी हुई शांति मानो थके हुए मन को विश्राम देने के लिए ही बनी थी।एक दिन उसी वृक्ष के नीचे एक वृद्ध संत आकर ठहरे। उनके मुख पर तप का तेज था और आँखों में करुणा की अथाह गहराई। वे अधिक बोलते नहीं थे, पर उनके पास बैठने मात्र से लोगों के मन का बोझ हल्का हो जाता था।धीरे-धीरे गाँव के लोग उनके पास आने लगे। कोई धर्म की चर्चा सुनता,