अस्तित्व बनाम दावा (मैं)

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   अस्तित्व बनाम दावा(“मैं”) : कर्ता की समस्या का नया फ्रेममनुष्य सामान्यतः अपनी आध्यात्मिक उलझनों को “आत्मा बनाम अहंकार”, “ज्ञान बनाम अज्ञान”, या “धर्म बनाम अधर्म” की भाषा में समझने का प्रयास करता है। इन द्वन्द्वों की उपयोगिता है, पर वे एक बुनियादी गड़बड़ी को सीधे-सीधे सामने नहीं लाते: वास्तविक अस्तित्व और मनुष्य द्वारा किये गए मानसिक दावे  (“मैं”) के बीच का असंतुलन। यही वह अनुपातिक असंतुलन है जहाँ से कर्ता की पूरी समस्या जन्म लेती है।1. व्यवस्था और व्यक्ति: अनुपात की बुनियादअस्तित्व की व्यवस्था अत्यंत विशाल, जटिल और बहुस्तरीय है।भौतिक स्तर पर यह ब्रह्माण्डीय घटनाओं से लेकर जैविक, न्यूरोलॉजिकल और