श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 23

  • 165
  • 87

श्री और सार्थक आपस में बात कर रहे थे अब तक सार्थक अपने मन की बात श्री को बता चुका था । और ये एहसास भी दिल चुका था कि मनुष्य को शरीर के आकर्षण से नहीं बल्कि मन की सुंदरतावसे देखा जाता है  इसके बाद श्री सार्थक से कहती है — सार्थक जी तो क्या आप इसलिए पूरी रात रोते रहे क्यूंकि आज आपको लगा कि अगर आप अपने मन की बात मुझे बताएंगे तो कही मैं नाराज न हो जाऊं और मित्रता समाप्त न हो जाए सार्थक— श्री आप हमे कितना अच्छे से समझती है माफी