खोटा सिक्का - 2

  • 129
  • 54

चंद रुपयों से न तो पेट भर भोजन मिल सकता था और न ही रेल की टिकट खरीदी जा सकती थी। भूख, अपमान और अनिश्चित भविष्य की चिंता उसके साथ-साथ चल रही थी। किंतु भीतर कहीं एक सूक्ष्म स्वर उसे पुकार रहा था। न जाने क्यों उसके कदम काशी की ओर मुड़ गए।उसने दूर आकाश की ओर देखा, मन ही मन माता-पिता को प्रणाम किया और बनारस जाने वाली ट्रेन में चढ़ गया।कई दिनों की भूख और थकान ने उसके चेहरे की चमक छीन ली थी। आँखें धँस गई थीं और शरीर दुर्बल हो चुका था। टिकट न होने के