प्राप्ति नहीं, प्रसाद

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प्राप्ति नहीं, प्रसादजीवन का मूल सूत्रमनुष्य सोचता है कि उसे सब कुछ पाना है। धन पाना, सफलता पाना, सम्मान पाना, ईश्वर पाना, मोक्ष पाना। परंतु सत्य इससे भिन्न है।जो वास्तव में तुम्हारे जीवन के लिए आवश्यक है, वह पहले से ही अस्तित्व की व्यवस्था में तुम्हें मिलने वाला है। मनुष्य कुछ भी अपने अहंकार से प्राप्त नहीं करता; वह केवल जो मिलता है, उसे अपना परिश्रम मानकर "मैंने पाया" का भ्रम पाल लेता है। यही भ्रम कर्तापन और अहंकार को जन्म देता है।जो मिला, वही एक बीज है। उस बीज में अनंत वृक्ष छिपा है। यदि तुम बीज का सम्मान