सत्य पथी

  • 282
  • 75

ऋगुवेद सूक्ति--(२७) की व्याख्या  मन्त्र —“मा प्रगाम पथोवयम्”  ऋग्वेद_ १०.५७.१भावार्थ --हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।पदच्छेदमा — नहींप्रगाम — आगे बढ़ें / जाएँपथः — मार्ग सेवयम् — हमभावार्थ--“हम (सत्य) मार्ग से विचलित न हों।”यहाँ “पथः” का अर्थ सामान्य मार्ग नहीं, बल्कि ऋत, धर्म और सत्य का मार्ग है — वही जिसे वैदिक परम्परा में वेदमार्ग कहा गया है।दार्शनिक अर्थ--यह मन्त्र एक प्रार्थना है —हम अधर्म, अज्ञान या विपरीत आचरण की ओर न जाएँ।हम सत्य, ऋत और देवमार्ग पर स्थिर रहें।हमारा जीवन वेद-विहित मर्यादा से पृथक न हो।ऋग्वेद मन्त्र--मा प्र गाम पथो वयम् मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः।मा नो अर्वाग् रीरिषो मा परा