MTNL की घंटी - 25

  • 924
  • 294

देव ने चुपचाप कार का दरवाज़ा खोला। महक का चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था, आँखों में डर, दर्द और टूटी हुई उम्मीदें। उसके काँपते कदम जैसे खुद भी नहीं जान रहे थे कहाँ जा रहे हैं।देव ने उसका हाथ थामा।“महक... बस कुछ देर... यहां से दूर चलें,” उसकी आवाज़ में वो स्थिरता थी, जो बिखरे हुए मन को थाम ले।महक बिना कुछ कहे कार में बैठ गई। उसके चेहरे पर गहराता दर्द देखकर देव का दिल कसक उठा। रास्ते भर महक खिड़की की ओर देखती रही — मौन, मगर भीतर तूफ़ान सा हाहाकार।रिसॉर्ट की चहल-पहल से दूर, किसी सुनसान