प्रियं ब्रूयात

ऋगुवेद सूक्ति-- (58) की व्याख्या प्रियं वद्।ऋगुवेद --8/89/3अर्थ--प्रिय बोलो। ऋग्वेद 8.89.3 का पूरा मंत्र इन्द्र स्तुति से संबंधित है। ऋग्वेद 8.89.3 मूल मंत्र“प्रियं वदन्निन्द्र मृळयास्मान्त्वं नो राजा वसुपते वसोना।अस्मभ्यं शर्म बहुलं वि यच्छविश्वाहा नो अभयं कृणुहि॥” भावार्थहे इन्द्र! मधुर वचन बोलते हुए हम पर कृपा करो। तुम हमारे रक्षक और धनदाता हो, हमें भरपूर सुख और सुरक्षा दो, और हमें सदा निर्भय बनाओ।“प्रियं वद” का संदर्भ--यहाँ “प्रियं वदन्” का अर्थ है— मधुर, अनुकूल, कृपालु वाणी बोलना।अर्थात् वेद में भी देवता से यही प्रार्थना है कि—वाणी मधुर हो, व्यवहार कृपालु हो।विस्तृत अर्थ--यह मंत्र हमें सिखाता है कि—मनुष्य को हमेशा मधुर, नम्र और सुखद वाणी बोलनी चाहिए।वाणी ऐसी