अमृत वाणी - संत वाणी - 24

संत कबीरदास जी का यह दोहा समाज में ज्ञान और व्यवहार के गहरे अंतर को समझाकर जीवन को पूरी तरह पारदर्शी और सच्चा बनाना सिखाता है।“कथनी मीठी खांड सी, करनी विष की लोय।कथनी तजि करनी करे, विष से अमृत होय।।”गहरे अर्थ की व्याख्यासिर्फ मुंह से मीठी-मीठी बातें करना या दूसरों को ज्ञान की बातें सिखाना शक्कर (खांड) की तरह बहुत अच्छा और सुखद लगता है, लेकिन उन बातों को अपने खुद के व्यवहार में न लाना जहर की एक छोटी सी गोली की तरह नुकसानदेह होता है। जो व्यक्ति दूसरों को उपदेश देना और बड़ी-बड़ी बातें करना छोड़ देता है,