प्रेम

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय।जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय॥~ कबीर साहबप्रेम प्रेम सब कहते हैं, पर प्रेम को सच में बहुत कम लोग जानते हैं। प्रेम कोई शब्द नहीं, कोई भावना नहीं, कोई संबंध नहीं—प्रेम मन की वह अवस्था है जहाँ मन स्वयं से हटकर पूरी तरह दूसरे की भलाई में ठहर जाता है, बिना किसी अपेक्षा के। वहाँ यह उम्मीद भी नहीं रहती कि बदले में प्रेम मिलेगा। क्योंकि जैसे ही उम्मीद आई, वहीं स्वार्थ आ गया, और जहाँ स्वार्थ आया वहाँ प्रेम समाप्त होकर लेन-देन शुरू हो गया। लेन-देन व्यापार होता है, प्रेम