शिक्षा स्मृति है, शास्त्र संकेत है, दृष्टि बोध है।जब मन कहता है—“कृष्ण ऐसे थे।”“बुद्ध ऐसे थे।”“राम ऐसे थे।”तो वह प्रायः इतिहास, स्मृति और किसी दूसरे के अनुभव को दोहरा रहा होता है।यह शिक्षा हो सकती है।यह सूचना हो सकती है।यह विचार हो सकता है।लेकिन अभी यह बुद्धिमत्ता नहीं है।बुद्धिमत्ता उस क्षण शुरू होती है, जब प्रश्न बदल जाता है—“वे क्या समझे थे?” से “मैं अभी क्या देख रहा हूँ?”यहीं से दर्शन उधार का नहीं रहता।जिस क्षण मनुष्य किसी महान व्यक्ति के निष्कर्ष को दोहराने के बजाय अस्तित्व को स्वयं देखना शुरू करता है, उसी क्षण उसकी अपनी दृष्टि से दर्शन