राज़ के सात फेरे - 2

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अन्विका अपने भारी लहँगे को सँभालते हुए धीरे-धीरे मंडप की ओर बढ़ गई। उसके पायल की मधुर छनछनाहट पूरे हॉल में गूँज रही थी। चारों तरफ बैठे मेहमानों की निगाहें उसी पर टिकी हुई थीं। वहीं दूसरी ओर रुद्रांश अब भी अपनी जगह पर खड़ा था। उसकी आँखें अन्विका पर टिकी थीं, लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं था।तभी यशवर्धन राठौर उसके पास आए और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए मुस्कुराकर बोले—"क्या हुआ रुद्रांश? यहाँ खड़े-खड़े क्या सोच रहे हो?""पंडित जी कब से तुम्हें बुला रहे हैं।""जाओ... अब दूल्हे राजा को भी मंडप में पहुँच जाना चाहिए।"पिता की आवाज