पत्रसुबह की ठंडी हवा ओस की बूँदों को समेटे हुए हवेली के बरामदे में बह रही थी। मीरा चौखट पर पत्थर की तरह बनी खड़ी थी, और उसके काँपते हाथों में वह पीला लिफ़ाफ़ा था।लिफ़ाफ़े का कागज़ अजीब तरह से सूखा था जैसे इस पर नीलगढ़ की ओस, बारिश या नमी का कोई असर ही न पड़ा हो। ओस से भीगे हुए बरामदे के बीचों-बीच रखा यह लिफ़ाफ़ा ऐसा लग रहा था मानो समय के किसी दूसरे आयाम से सीधा इस चौखट पर आ गिरा हो।मीरा ने अपनी साँसें रोक लीं। उसकी उँगलियों ने लिफ़ाफ़े के ऊपरी हिस्से को छुआ।