धार्मिक जीवन में कथा सुनने की परंपरा बहुत पुरानी है। किसी धार्मिक ग्रंथ की कथा सुनना केवल शब्दों को सुनना नहीं होता, बल्कि उसमें भाव, भक्ति, श्रद्धा, श्रवण और धार्मिक वातावरण भी जुड़ा होता है। कथा के माध्यम से किसी प्रसंग को सुनना मन को प्रभावित कर सकता है और धार्मिक परंपरा से जोड़ सकता है। लेकिन कथा सुनने और किसी धार्मिक ग्रंथ का स्वयं अध्ययन करने में अंतर है। इन दोनों को एक ही कार्य मानना आवश्यक नहीं है।एक सरल और विचार करने योग्य पद्धति यह हो सकती है कि पहले मूल ग्रंथ को स्वयं पढ़ा जाए और समझा