DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 3 Scene 5.

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शहर में चारो तरफ़ ठंड का सन्नाटा छाने लगा, सड़को पर गहरे अंधेरे ठंडे माहौल को और ठंडा करने लगे थे, अंधेरा होते ही ठंडी हवाओं ने लहराना शुरू कर दिया, बहती हवाएं जिनमें अलग से कई एहसास चुप थे, लोगों को छू कर उन्हें अपने होने का एहसास दिलाने लगीं। काले अंधेरे में वो हवाएं लहरा लहरा के खेलती, खिलखिलाती उन्हें चिढ़ाने लगी, सताने लगी कि अब उन्हें छुपना नही पड़ेगा, के अब तो सूरज ख़ुद छुपा बैठा है। वो कभी खेतों में जाती, कभी ऊंचे पेड़ो के पास जाकर उन्हें ख़ुशी से लहलहा कर बतातीं के अब तो काफ़ी