बिखराता मन

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अध्याय 1: ख़ामोश कमरा और चाय का कपघड़ी की टिक-टिक आवाज़ उस छोटे से कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। खिड़की के परदे हल्की हवा में फड़फड़ा रहे थे, और बाहर महानगर की दूर से आती गाड़ियों की आवाज़ें किसी बेसुरी सिम्फनी जैसी लग रही थीं। उस कमरे के कोने में रखी आरामकुर्सी पर बैठी थी तलब। उसकी आँखें सामने रखी चाय की ठंडी होती प्याली पर टिकी थीं, लेकिन उसका ध्यान मीलों दूर किसी अनजाने क्षितिज पर भटक रहा था।तलब का जीवन किसी उलझे हुए धागे की तरह था, जिसका सिरा ढूँढना नामुमकिन सा लगता था। उसके भीतर