"घोड़े तयार है साहब?" मैदान के पास थोड़ी दूर पर खड़े हुए मुंशीजी ने कबीर को मैदान से आता देख, तांगे के पास खड़े घोड़ा चरवाहा से तसल्ली लिया"हां मुंशीजी तयार हो गए है।" उसने जानकर अपनी आवाज़ ऊंची रखाउसकी आवाज़ मुंशीजी के साथ साथ कबीर के कानों में भी पहुंची, पलटकर तयार तांगे को देखकर मुंशीजी से उसका सवाल आया"क्या ये तांगा जाएगा?""हां तांगा जाएगा।""क्यों?""क्यों का क्या मतलब है साहब, हट्टे कट्टे नौजवान सिपाही आप है, लेकिन इस मौसम में आली जान इसपर ही जाएंगे।""मैने इसलिए ही पूछा मुंशीजी की अगर सिर्फ़ उन्हें जाना है तो ये बड़ा तांगा क्यों?""कबीर