अनकही परछाई

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सन्नाटे की दरारेंमुंबई शहर की बारिश अपनी एक अलग ही फितरत रखती है। जब यह बरसती है, तो ऐसा लगता है जैसे आसमान ने शहर की तमाम चीखों और भागदौड़ को अपने भीतर समेट लिया हो। रात के ठीक ढाई बज रहे थे। आउटर एरिया के इस शांत और सुनसान मोहल्ले में, जहां दूर-दूर तक गाड़ियों के हॉर्न की आवाज या इंसानी हलचल सुनाई नहीं देती थी, सिर्फ बारिश की बूंदों के टिप-टिप करने की एक एकरस और सुस्त आवाज गूंज रही थी।नयना अपनी स्टडी टेबल के सामने लाचारी से बैठी थी। उसकी आँखें लाल थीं, जिन पर पिछले कई