अनकही राहे

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एपिसोड 1: वो नई दुकानवह पुराना जाना-पहचाना रास्ता आज थोड़ा अलग लग रहा था। शाम के धुंधले उजाले में जब मैं अपने हमेशा वाले मोड़ पर पहुँचा, तो देखा कि वहाँ एक पुरानी छोटी सी दुकान थी—जो कल तक वहाँ बिल्कुल नहीं थी। दुकान के बाहर एक पुरानी पीतल की घड़ी टंगी थी, जिसकी सुई आगे नहीं, पीछे की तरफ घूम रही थी।मैं थोड़ा हिचकिचाया, पर बिना सोचे-समझे अंदर चला गया।अंदर एक पुराना प्याला रखा था जिसमें से अभी भी धुआँ निकल रहा था, और लकड़ी की मेज़ पर एक पुरानी चमड़े की जिल्द (leather-bound) वाली डायरी खुली हुई थी।