मन रे तू काहे न धीर धरे

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हम बाकायदा पिछले दस आम-चुनाओं के सजग-चैतन्य मतदाता रहे सुबह सात बजे मतदान देने ,बाकायदा लाइन हाजिर हो जाते थे न हम नेताओं के भाषण को मन में रखते थे न उनके वादों के अमल होने की कोई कामना पालते थे हमारे मन में पता नहीं क्यों ये शुरू से बैठा था कि जो भी आयेंगे चोर-धोखेबाज-दगाबाज ही आयेंगे