"जिस दिन इंसान नहीं, किस्मत रोई थी..." रात के ठीक बारह बजे... आसमान जैसे अपना सारा दर्द धरती पर उँडेल रहा था। बिजली की हर कड़क के साथ पूरा शहर काँप उठता, और उसी बारिश में शहर के बाहर स्थित एक पुराने शिव मंदिर की सीढ़ियों पर एक नन्हा-सा बच्चा लगातार रो रहा था। उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी... लेकिन शायद भगवान तक पहुँच रही थी। मंदिर के सामने से दर्जनों लोग गुज़रे। किसी ने एक नज़र देखा... फिर अपनी छतरी सिर पर ठीक की और आगे बढ़ गया। "किसी पाप की औलाद होगी..." एक औरत ने घृणा से कहा।
अनाथ - अध्याय 1
जिस दिन इंसान नहीं, किस्मत रोई थी... रात के ठीक बारह बजे... आसमान जैसे अपना सारा दर्द धरती उँडेल रहा था। बिजली की हर कड़क के साथ पूरा शहर काँप उठता, और उसी बारिश में शहर के बाहर स्थित एक पुराने शिव मंदिर की सीढ़ियों पर एक नन्हा-सा बच्चा लगातार रो रहा था। उसकी आवाज़ बहुत छोटी थी... लेकिन शायद भगवान तक पहुँच रही थी। मंदिर के सामने से दर्जनों लोग गुज़रे। किसी ने एक नज़र देखा... फिर अपनी छतरी सिर पर ठीक की और आगे बढ़ गया। किसी पाप की औलाद होगी... एक औरत ने घृणा से कहा। ...Read More
अनाथ - अध्याय 2
रात गहरा चुकी थी। अनाथालय के लंबे बरामदों में सन्नाटा पसरा हुआ था। टूटी हुई खिड़कियों से आती ठंडी दीवारों से टकराकर अजीब-सी आवाज़ें पैदा कर रही थी। बाहर चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ था और पूरा परिसर अंधेरे में डूबा था। लेकिन... स्टोर रूम के अंदर बैठा मानव सो नहीं रहा था। उसकी पीठ पर डंडों के ताज़ा निशान थे। चेहरे पर चोट के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे। फिर भी उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। वह चुपचाप उसी पुराने संदूक के सामने बैठा था, जो वर्षों से किसी ने खोला तक नहीं था। दिन ...Read More
अनाथ - अध्याय 3
उस रात... आसमान पूरी तरह शांत था। बारिश रुक चुकी थी, लेकिन हवा में अब भी मिट्टी की भीनी-सी तैर रही थी। अनाथालय के सभी बच्चे गहरी नींद में सो चुके थे। पूरे परिसर में सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। लेकिन... मानव की आँखों में नींद नहीं थी। वह स्टोर रूम के उसी कोने में बैठा था, जहाँ उसे वह रहस्यमयी डायरी मिली थी। दिनभर की मार, अपमान और दर्द के बावजूद उसके मन में सिर्फ़ एक सवाल घूम रहा था— "मैं कौन हूँ?" उसने एक बार फिर डायरी का आख़िरी पन्ना खोला। जैसे ही उसने ...Read More