रात गहरा चुकी थी।
अनाथालय के लंबे बरामदों में सन्नाटा पसरा हुआ था। टूटी हुई खिड़कियों से आती ठंडी हवा दीवारों से टकराकर अजीब-सी आवाज़ें पैदा कर रही थी। बाहर चाँद बादलों के पीछे छिपा हुआ था और पूरा परिसर अंधेरे में डूबा था।
लेकिन...
स्टोर रूम के अंदर बैठा मानव सो नहीं रहा था।
उसकी पीठ पर डंडों के ताज़ा निशान थे।
चेहरे पर चोट के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे।
फिर भी उसकी आँखों में आँसू नहीं थे।
वह चुपचाप उसी पुराने संदूक के सामने बैठा था, जो वर्षों से किसी ने खोला तक नहीं था।
दिन में भैरव सिंह की मार खाते समय भी उसके मन में एक ही बात घूम रही थी—
"क्या मेरी ज़िंदगी हमेशा ऐसी ही रहेगी?"
उसने धीरे-धीरे संदूक का ढक्कन खोला।
धूल का एक बादल हवा में फैल गया।
अंदर कुछ पुराने कपड़े...
कुछ धार्मिक पुस्तकें...
एक टूटी हुई लालटेन...
और नीचे दबा हुआ चमड़े का एक मोटा-सा बंधा हुआ बस्ता रखा था।
मानव ने उसे बाहर निकाला।
धूल साफ़ की।
वह एक पुरानी डायरी थी।
उसका चमड़ा जगह-जगह से फट चुका था।
किनारों पर समय की मार साफ़ दिखाई दे रही थी।
लेकिन उसके पहले पन्ने पर लिखे शब्द आज भी बिल्कुल स्पष्ट थे—
"यदि यह डायरी किसी ऐसे बच्चे के हाथ लगे जिसे दुनिया ने ठुकरा दिया हो... तो समझ लेना, अब यह उसी की है।"
मानव कुछ पल तक उन शब्दों को पढ़ता रहा।
जैसे किसी ने उसके दिल की बात लिख दी हो।
उसने अगला पन्ना खोला।
उसमें लिखा था—
"गरीब होना कमजोरी नहीं है।
अकेला होना हार नहीं है।
असली हार उस दिन होती है, जब इंसान खुद पर विश्वास करना छोड़ देता है।"
मानव हर शब्द ध्यान से पढ़ता गया।
डायरी किसी साधारण व्यक्ति की नहीं थी।
उसमें जीवन के अनुभव...
रणनीति...
मनोविज्ञान...
व्यापार...
गणित...
शतरंज...
और इंसानी स्वभाव को समझने के अनगिनत सूत्र लिखे थे।
जितना वह पढ़ता गया...
उतना ही उसे महसूस हुआ कि जैसे कोई अदृश्य गुरु वर्षों बाद उससे बात कर रहा हो।
घंटों बीत गए।
अचानक...
डायरी के बीच से एक पुराना कागज़ नीचे गिरा।
उस पर हाथ से लिखा था—
"अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो याद रखना... तुम्हारी ज़िंदगी किसी संयोग का परिणाम नहीं है। तुम्हारे जन्म के पीछे एक ऐसा रहस्य छिपा है, जिसे बहुत से लोग दफ़न रखना चाहते हैं।"
मानव का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
उसने जल्दी-जल्दी अगले पन्ने पलटे।
लेकिन आगे के कई पन्ने फटे हुए थे।
मानो किसी ने जानबूझकर सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा निकाल लिया हो।
"कौन था... जिसने यह लिखा होगा?"
वह खुद से बुदबुदाया।
उसी समय...
स्टोर रूम के बाहर किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
मानव ने तुरंत डायरी बंद कर दी।
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
अंदर छोटू आया।
वह घबराया हुआ था।
"मानव..."
"तू यहाँ है?"
"मैं तुझे पूरे अनाथालय में ढूँढ़ रहा था।"
मानव ने पूछा—
"क्या हुआ?"
छोटू ने चारों ओर देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा।
फिर धीरे से बोला—
"मैंने अभी भैरव सिंह को दो अजनबी लोगों से बात करते सुना है।"
"वो लोग तेरे बारे में पूछ रहे थे।"
मानव चौंक गया।
"मेरे बारे में?"
"हाँ..."
"उन्होंने तेरे गले में पड़े त्रिशूल वाले लॉकेट का भी ज़िक्र किया।"
मानव अनायास अपने लॉकेट को पकड़कर खड़ा हो गया।
छोटू की आवाज़ और धीमी हो गई।
"और जाते-जाते उन लोगों ने सिर्फ़ एक बात कही..."
"लड़का ज़िंदा नहीं बचना चाहिए।"
मानव के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
आख़िर एक अनाथ बच्चे से किसी को इतनी दुश्मनी क्यों थी?
क्या सचमुच उसके जन्म में कोई ऐसा राज़ छिपा था...
जिसके लिए लोग उसकी जान लेना चाहते थे?
उस रात...
पहली बार...
मानव ने फैसला किया—
अब वह अपनी किस्मत का इंतज़ार नहीं करेगा...
वह अपनी किस्मत खुद लिखेगा।
लेकिन उसे नहीं पता था...
कि यह फैसला उसे सीधे ऐसी दुनिया में ले जाने वाला है...
जहाँ हर मुस्कान के पीछे एक धोखा...
और हर सच्चाई के पीछे एक नई साज़िश छिपी हुई थी।
उसके जीवन का सबसे खतरनाक सफ़र अब शुरू होने वाला था...
और यही था—
"तूफ़ान की पहली आहट।"