फिर भी शेष - 3

फिर भी शेष

राज कमल

(3)

नियम जैसी फालतू चीजें सुखदेव के जीवन में नहीं हैं। कायदा—कानून होते हैं पुलिस, मिलिट्री में, और साधु—संतों के आश्रम में। सीधे—साधे गृहस्थ जीवन में सब जायज होना चाहिए, युद्ध और प्यार की तरह। मन का कहना मत टालो, मन खुश तो सब अच्छा।

घर से निकलकर वह पहले मंदिर जाता, लेकिन यह जरूरी नहीं कि उसमें उलट—फेर न हो। यह तो प्राथमिकता तय करती है कि उसे कहां जाना चाहिए। कभी वह पहले मंदिर जाकर फिर गुरुद्वारा चौक से लाटरी का टिकट लेता है तो कभी जेब भारी हुई तो पहले लाटरी का टिकट खरीदकर प्रभु के चरणों में रख देता है। आज जेब बिल्कुल खाली थी, लेकिन हिमानी से पैसे मांगने की हिम्मत नहीं हुई। इसलिए घर से निकलकर वह सीधा टैक्सी स्टैंड की ओर बढ़ गया।

पिछले दो—तीन साल से ही उसे लाटरी पर दांव लगाने का चस्का लगा है। सोचता है, ‘रातो—रात लखपती बन जाए। एक बड़ी फैक्टरी जम जाए और कुछ टैक्सियां चलने लगें और वह शाम को गद्‌दी पर बैठकर नोटों की गडि्‌डयां तिजोरी में संभालता रहे। उसके यार, लाटरी के अड्‌डे पर मिलने वाला राज मिस्त्री राजाराम, गुरुद्वारा चौक के नुक्कड़ पर चाय वाला सुमेरा, फ्रूट चाट वाला बंसीधर, पनवाड़ी गोरख, मोटरसाइकिल—स्कूटर रिपेयर करने वाला उस्ताद करीम और गुरुद्वारा चौक पर बैंक की बिल्डिंग के कौने पर टैक्सी स्टैंड के उसके कुछ साथी टैक्सी ड्राइवर—मल्कीत, बलवीर वगैरह के साथ शराब के दौर चलें, लतीफें हों, चुहलबाजी हो, कहकहे लगें। फिर साली हिमानी जाए भाड़ में। जब जर—जमीन पल्ले में हो तो जोरू की क्या कमी। राजाराम बहुतों को जानता है, पैसे भी ज्यादा नहीं मांगतीं और सारी रात आपकी मर्जी पर, चाहो तो नंगी नचाओ। फिर भी, साली मनी में कुछ खास बात है, लेकिन साली मुझे प्यार से देखती तक नहीं।'

ऐसे सपने देखते—देखते बना तो कुछ नहीं, अपने पास जो था, उसे भी गवां बैठा। खराद की अपनी फैक्टरी थी। चार लेथ मशीनों पर अच्छा—खासा काम निकलता था। तुरंत धनी बनने के चक्कर में काम में दिलचस्पी कम कर दी, यहां तक कि फैक्टरी जाना ही पैसे मांगने के लिए होता था। बड़े भाई हरदयाल ने कुछ समय तो बर्दाश्त किया, अंत में पेरशान होकर बाप से मशविरा किया। महादेव सिंह नहीं चाहते थे कि बटवारा हो। वे जानते थे कि सुखदेव सारे पैसे मिट्‌टी में मिला देगा, हिमानी और बच्चों के भविष्य का रहा—सहा जरिया भी मिट जाएगा। उधर बड़ी बहू ने एक नहीं चलने दी। बटवारा हो गया तो महादेव सिंह ने जबरन कुछ रकम हिमानी के नाम डिपॉजिट करवा दी। शेष रकम में से सुखदेव ने टैक्सी खरीद ली और चलाने लगा, किंतु लाटरी के फेर में जल्दी ही टैक्सी भी हाथ से निकल गई। वह केवल ड्राइवर बनकर रह गया। ज्यादा शराबखोरी से बीमार पड़ गया तो ड्राइवरी का सिलसिला भी टूट गया। दो महीने रामा—कृष्णा चेरिटेबल अस्पताल में ट्‌यूबरक्लोसिस का इलाज हुआ। साल भर दवाइयां खाकर कोर्स पूरा किया। तब जाकर जिंदगी फिर से पटरी पर लौटी थी। जब तक टैक्सी थी, सुखदेव शाम को कुछ न कुछ देता ही था। अब लाटरी तो लाटरी है, जिस दिन लग जाती है तो अगले दिन बड़ा दांव लगा देता है। गुरुद्वारा रोड पर उसकी दोमंजिली कोठी है। महादेव सिंह ने अपने जमाने में बनवाई थी। अपना काम था, नौकरी भी थी, ऊपर से सस्ते का जमाना था, पता ही नहीं चला कैसे इतनी बड़ी जायदाद बन गयी। लड़कों ने उसमें बढ़ाया तो कुछ नहीं; अलबत्ता शहर के बीचोंबीच खास बाजार में खड़ी इस कोठी के कारण सीना फुलाए जरूर घूमते रहे। व्यापारियों की गिद्ध दृष्टि से भी यह अछूती नहीं है। कोठी के नीचे के आधे हिस्से में फैक्टरी है और शेष किराए पर उठी हुई है। पहली मंजिल के आधे—आधे हिस्से में दोनों भाई सपरिवार रहते हैं। बीच का आंगन साझा है। दूूसरी मंजिल पर सिर्फ दो ही कमरे हैं, जिसमें महादेव सिंह अपनी पत्नी के साथ रहते थे। किराया भी उन्हीं के पास जाता था। महादेव सिंह जब तक जीवित थे, हिमानी को अघोषित रूप से आर्थिक मदद करते रहते थे। उनके बाद सास ने छोटी बहू को एक पैसा कभी नहीं दिया। अब जबकि ऊपर का एक कमरा भी किराए पर दे दिया है, उसका पैसा भी अपने खाते में रखती है।

इसलिए हिमानी शुरू से ही काम में खटती रही। वह जान गई थी कि बच्चों को पालना—पोसना है तो सुखदेव के भरोसे नहीं रहा जा सकता। ऐसी स्थिति में हिमानी प्यार भरी नजर कहां से ले आए? सुखदेव यह सब नहीं जानता। जानता भी है तो महसूस नहीं करता।

सुखदेव जब चाय वाले सुमेर सिंह की दुकान पर पहुंचा तो वह खीझ से भरा हुआ था, ‘जब दिन खोटा हो तो सब तरफ से लात ही पड़ती है...' टैक्सी स्टैंड पर नरेंद्र नहीं मिला तो उसने यही सोचा था, आज का पूरा दिन उधारी पर गुजरेगा। ठेकेदार से पूछताछ करके वह लौट ही रहा था कि तभी नरेंद्र आ गया। बाप को देखकर नरेंद्र समझ गया कि जेब खाली है, क्योंकि सुखदेव वैसे कभी उसके पास नहीं फटकता। इसलिए किसी को ज्यादा कुछ कहना—सुनना नहीं पड़ता। नरेंद्र चुपचाप सुखदेव के हाथ पर पैसे रख देता और वह लेकर चला जाता। आज नरेंद्र ने छूटते ही कह दिया, ‘‘मेरे पास नहीं हैं पैसे—वैसे।'' कुछ देर तक तो सुखदेव रिरिआया—सा ‘बेटा—बेटा' करता रहा। फिर एकदम उखड़ गया, ‘‘साले बाप को आंख दिखाता है...कमीना, कुत्ता...देखो! ये कि सुनो इसकी बात। कोई एहसान करता है...ओय, मैं तेरा बाप हूं, बाप!'' स्टैंड पर बाकी लोग अपने—अपने कामों में लगे कनखियों से देखते हुए मजा ले रहे थे। दोनों को सभी जानते हैं और यह भी पता है कि इसी तरह ड्रामा करते रहते हैं। कुछ नहा रहे थे, कुछ तहमद लपेटे चारपाई पर पड़े थकान उतार रहे थे। नरेंद्र भी तैश में आकर बोला, ‘‘तू ज्यादा बाप—बाप का गाना मत गा, सब जानते हैं। रोज—रोज कहां से दूं...कोई मशीन लगी है मेरे पास... और यह बता, बाप होकर तूने किया क्या है, क्या दिया है मुझे...हिस्से की जो रकम थी, वो भी उस महारानी ने बैंक में डाल दी अपने नाम...जा, उसी से मांग।'

‘‘उसने नहीं दिए बेटा, तभी आया हूं तेरे पास...और कहां जाऊं... ये कि तू मेरा गला घोंट दे। किस्सा खतम कर एक दफा में।'' सुखदेव ने रुख बदलकर देखा था।

किसी ने चुटकी ली, ‘‘बड़ा चालू है, लाैंडे के लिए भी फांसी का इंतजाम कर रहा है।''

ठेकेदार जगतार सिंह पुराना परिचित था। कभी साथ—साथ टैक्सी चलाते थे। जब सुखदेव गुस्से में भरकर चिल्लाया, ‘‘बुढ्‌ढा होगा तेरा बाप कुुत्ते! ये कि अपनी बहन को भेज, तब पता चलेगा...बुढ्‌ढा बोलता...है।'' तब टैक्सी स्टैंड के ठेकेदार ने ही रोका था, ‘‘अरे यार, अब बस्स भी कर...लड़का है, मजाक कर दिया...मैं कहता हूं तू छोड़ लाटरीबाजी...फिर से गाड़ी क्यों नहीं चलाता...।' इस बात पर भी दूसरे ड्राइवर ने टिप्पणी कर दी, ‘‘ ओ साब जी, उससे तो अब घर वाली टैक्सी भी नहीं चलती।'' इससे पहले कि ठेकेदार उस लड़के को डपटता, तब तक नरेंद्र उससे जाकर भिड़ गया। लात—

घूंसे दोनों ओर से चलने लगे। आस—पास से सभी लोग बीच—बचाव के लिए दौड़े।

नरेंद्र जोर—जोर से चिल्ला रहा था, ‘‘बहन के...साले काट डालूंगा...घर तक पहुंचता

है...'' लेकिन नन्नू ही देखते—देखते लहू—लुहान हो गया। मुकाबले में दूसरा लड़का शरीर और उम्र से भारी था। चौराहे पर खड़ा पुलिस वाला भी आ धमका। जगतार के बहुत समझाने के बावजूद दोनों को पकड़कर थाने ले गया। ऐसे में सुखदेव मौका देखकर ही दूर हट गया था। उसने सोचा था, अगर उसे भी पकड़ ले गए तो भूखा पेट पुलिस के डंडों से भरेगा। दूसरी बात यह कि बाहर रह कर ही वह नन्नू को छुड़ाने की कोशिश कर सकेगा। सुखदेव ने चाय पीकर गिलास रखा ही था कि लाटरी के अड्‌डे पर मिलने वाला मिस्त्री राजाराम सामने खड़ा था। दो बीडियां सुलगाकर उसने एक सुखदेव को दी और दूसरी को अपनी उंगलियों में दबा कर बोला, ‘‘क्याें गुरु! आज उधर नहीं आए।'' सुखदेव कुछ जवाब देता, इससे पहले ही गोरख ने कहा, ‘‘आज गुरु उखड़े—उखड़े हैं, कुछ बोलते ही नहीं।''

‘‘टेंट में दाम न हो तो हंसना—बोलना भी नहीं सुहाता भाई...ये कि ऊपर से वो हरामखोर नन्नू खामखां मार—पीट कर बैठा। अब पुलिस ले गई उठाकर...ये कि उनकी दक्षिणा के लिए भी रोकड़ा चाहिए...यहां किस्मत पर ऐसा ताला लगा है कि हजार—पांच सौ से ऊपर इनाम ही नहीं निकलता।'' उसकी इस मायूसी पर सब ने मुंह छोटा कर लिया।

‘‘जी छोटा ना करो सुक्खी लाला...लाखों की जायदाद खड़ी है बीच बाजार में

...तुम तो भैया सोलह आना टनाटन सेठ हो, एकदम लखपती।' क्याें भाई, इसमें कुछ झूठ है क्या?'' राजाराम और गोरख ने भी हां में हां मिलाई।

एक पल में सुखदेव का सपना जैसे साकार हो गया। वह महसूस करने लगा कि वह लखपती है। जेब में हाथ डाला, खाली थी, एक बीड़ी तक नहीं निकली। राजाराम ने उसे फिर बीड़ी जलाकर दी, ‘‘बिल्डिंग का कुछ होगा, तभी जेब में नोट आएंगे...जब कहो, तब पार्टी से बात करवा दूं, पर तुम तो पहले हरदयाल से बात करो।''

‘‘जब मौका होगा, तभी बात करूंगा भाई! जानते तो हो...ये कि घर में मेरे सभी दुश्मन हैं। सबसे पहले तो उस नन्नू को छुड़ाने की जुगाड़ करनी पडे़गी...ये कि क्या आफत है सालीकरे कोई, भुगते कोई...।'' उसकी इस बड़बड़ाहट पर बीड़ा बांधकर ग्राहक को निपटाते हुए गोरख बोला, ‘‘तुम्हारे घरवालों के तो बड़े—बड़े लोगों से रसूख हैं, तब काहे की फिकर... सुना है, घर भी आना—जाना है...।'' उसने आंख दबाकर यारों की ओर देखा। सभी मुस्करा रहे थे। सुखदेव ने घूर कर गोरख को देखा। कुछ देर बाद बोला, ‘‘ समझता हूं, सब समझता हूं पनवाड़ी...ये कि शहर आकर बहुत चर्बी चढ़ी है तुझे...साला, ये कि जब देखो, तब...''

‘‘देख, देख सुक्खी, गाली नहीं देना। हां, बोल देता हूं...।'' राजाराम ने सुखदेव को शांत किया और गोरख को बनावटी डांट पिलाई। फिर सुखदेव के कान में फुसफुसाकर कुछ कहा, जिसे सुनते ही उसके चेहरे पर रौनक लौट आई ‘‘वाह! ये कि राजाराम, यह हुई ना बात।''

‘‘और क्या! जब वो अंदर जाएगी, तभी इन झंझटों से लड़ने की हिम्मत आएगी

...दांव के लिए कुछ पैसों का भी इंतजाम हो जाएगा। तू चल तो सही।''

जब वे दोनों चलने को हुए, तभी करीम मिस्त्री हाथों में लगी गिरीस पोंछता हुआ चाय पीने आया। वह पूछता ही रह गया कि भाई, कहां चल दिए, पर वे रुके नहीं। सुखदेव ने सुना, गोरख कह रहा था, ‘‘अरे मियां, भाई और कहां जाएंगे मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक,'' साथ ही यह भी जोड़ दिया, ‘माफ करना, कहावत है।'

बात को अब चाट वाले बंसीधर ने अपने हाथ में लिया। बोला, ‘‘ये हरामी है गोरख, उसके सामने उसकी घरवाली के बारे में ऊंच—नीच बकता है।''

‘‘अरे, बकता क्या है, वही रेडीमेड कम्पनी वाले, सब जानते हैं... हमने एक दिन कह दिया, हम क्या मर गए हैं भौजी! हमें भी कभी सेवा का अवसर दो। बस, सुनते ही बिगड़ गई। बहुत भला—बुरा कहा, पुलिस की धमकी दी।''

‘‘अब समझा, तुम खम्बा क्यों नोंच रहे हो।'' जोर से हंसा बंसीधर। उसके हाथ से कटे हुए फल का टुकड़ा उछलकर नीचे गिर गया।

‘‘बड़ी दमदार औरत है...जब भी देखता हूं खुदा कसम! सुक्खी की किस्मत पर रस्क होता है, ‘छदूंदर के सिर में चमेली का तेल...। क्यों गोरख, कहावत ठीक है न...''

‘‘एकदम खरी।'' कहकर गोरख ग्राहकों में व्यस्त हो गया।

मिस्त्री के पीछे—पीछे सुखदेव घिसटता चला जा रहा था। जब वह रेडीमेड कम्पनी की बिल्डिंग के सामने से गुजरा तो एक पल ठिठका। फिर घृणा और क्रोध के मिले—जुले भाव से उस ओर थूक दिया। राजाराम ने मुड़कर पूछा, ‘क्या हुआ?' तो सुखदेव ‘कुछ नहीं' कहकर फिर चल पड़ा।

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