Natya purush - Rajendra lahariya - 7 in Hindi Moral Stories by राज बोहरे books and stories PDF | नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 7

नाट्यपुरुष - राजेन्द्र लहरिया - 7

राजेन्द्र लहरिया-नाट्यपुरुष 7

उस पूरे घटनाक्रम से गुज़र जाने के बाद, सहमे हुए-से कार के भीतर बैठे बूढ़े के पोते ने देखा था: कार की बग़ल में सड़क पर उसका पिता अभी तक पड़ा था - बिना हिले-डुले, बेहरकत। बूढ़े के पोते के हाथ में अभी तक कानों से निकाले गये प्लगों की डोरी सहित स्मार्टफ़ोन था। उसने उसे सीट पर रखा और वह कार से उतर कर सड़क पर पड़े अपने पिता के पास आया था। उसने अपने पिता के हाथ को पकड़ कर हिलाया और रुआँसी आवाज़ में कहा, ''पापा!’’

पर उसे कोई जवाब नहीं मिला। उसने फिर अपने पिता के हाथ को ज़ोर से हिलाया, और कहा, ''उठो, पापा!’’

पर उसे पिता की तरफ़ से फिर कोई जवाब नहीं मिला। तो वह पिता का हाथ पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से हिलाते हुए कह रहा था, ''उठो, पापाऽऽऽ... चलो, घर चलें... उठो, पापाऽऽऽ.... चलो....’’

परंतु उसका पिता सड़क पर बिना हिले-डुले पसरा हुआ, अपने पुकारते बेटे को कोई जवाब नहीं दे रहा था। यह देख-देख कर बूढ़े का पोता रोने लगा था और रोते-रोते ही अपने पिता को उठाने का प्रयास कर रहा था - वैसे ही जैसे कोई किसी सोते हुए व्यक्ति को जगाने की कोशिश करता है...

सड़क पर यह देख कर कुछ पैदल राहगीर दरयाफ्त करने के लिए रुके; कुछ-एक स्कूटर-बाइक-सवार भी मामले को समझने की उत्सुकता में रुक गये; और 'क्या हुआ?’... क्या बात हो गई?’...'क्या हुआ है?’ - जैसे सवालिया जुम्ले वहाँ सुनाई देने लगे। धीरे-धीरे एक मजमा वहाँ जुड़ गया।

उस मजमे में से निकल कर एक देहाती-सा दिखता व्यक्ति निकल कर बूढ़े के पोते के पास आया और उसके कंधे पर सांत्वना-भरा हाथ रख कर उससे बोला, ''बेटा, क्या बात है?’’ उसने सड़क पर पड़े बूढ़े के बेटे की तरफ इशारा कर आगे पूछा, ''क्या हुआ है इनको?’’

उस व्यक्ति की पूछताछ से बूढ़े के पोते को कुछ ढाढस मिला। उसने बताया, ''अंकल, मेरे पापा को कुछ लोगों ने मारा है...!’’

''क्यों?...’’

''पता नहीं!’’

सुनकर, पूछने वाले व्यक्ति ने एक बार गौर से, सड़क पर पसरे पड़़े बूढ़े के बेटे की ओर देखा था; फिर कहा था, ''लग रहा है कि बेहोश हो गये हैं’’, कह कर उसने बूढ़े के पोते की ओर देखा और कहा था, ''बेटा, घर पर कोई हो तो उन्हें बता दो, ये बेहोश हो गये हैं... घर पर और कौन है तुम्हारे?’’

''मम्मी हैं... दादू हैं...’’

''तो उन्हें फोन करके बता दो... फोन है तुम्हारे पास?’’ कहते हुए उस व्यक्ति ने अपने कुरते की जेब में हाथ डाल कर छोटा-पुराना-सा मोबाइल फ़ोन निकाल कर उसकी तरफ़ बढ़ाया, ''नहीं हो, तो लो, इससे बता दो...’’

''फ़ोन है अंकल मेरे पास...’’ कह कर बूढ़े के पोते ने कार के खुले डोर में से झुक कर, सीट पर रखा अपना स्मार्टफ़ोन उठा लिया; और उसमें कॉन्टेक्ट नंबर देखने लगा...

वहाँ जमा भीड़ को देख कर कुछ राहगीर रुकते; थोड़ी देर देखते; मामला समझने का प्रयास करते; फिर अपने रास्ते आगे बढ़ जाते। ज़्यादातर पैदल ही वहाँ रुक, भीड़ में घुस कर दरयाफ्त करते; कुछ देर खड़े रहते और फिर अपनी राह चले जाते। मोटर-बाइकों पर रेज रफ्तार निकलते लोगों में से कुछ-एक ने ही वहाँ रुकना मुनासिब समझा। सड़क से गुजरती कारों के सवार वहाँ जुड़े मजमे को देख कर कार को कुछ धीमी ज़रूर करते; पर कार से बाहर निकल कर मामले को जानने की ज़हमत उठाने से बचते हुए, आगे बढ़ जाते थे... उस भीड़ में अनेक लोग आ रहे थे और वहाँ से लौट कर जा रहे थे। अलबत्ता वह आदमी, जिसने बूढ़े के पोते के पास पहुंच उससे बात कर उसे ढाढस दिया था, अभी तक वहीं था - वह उस परेशान हाल मासूम बच्चे की मदद के लिए तत्पर था जिसका पिता सड़क पर बेहोश पड़ा था...

''हेलो, दादू!’’ बूढ़े के पोते ने नंबर डायल करने के बाद फ़ोन क़ान से लगाने के कुछ देर बाद कहा था, ''दादू, यहाँ कुछ लोगों ने पापा को मारा है... आप आ जाइए... यहाँ... रोड पर है हम.... कुछ लोग हमारे पास खड़े हैं.... एक अंकल ने मेरी हेल्प की... उन्होंने ही मुझसे आपको फोन करने को कहा... वे मेरे पास ही हैं... पर पापा उठ नहीं रहे हैं... कुछ बोल भी नहीं रहे हैं... सड़क पर पड़े हैं... कार के पास... आप जल्दी से आ जाइए यहाँ!’’ बूढ़े के पोते की आवाज़ पीड़ा, परेशानी और कंपन से भरी हुई थी।...

क्यू में लगे बूढ़े ने चेहरे पर आ गये पसीने को रूमाल से पोंछते हुए एकबार फिर 'महामहिमावान’ के अभिनंदन-मंच की ओर देखा; और आगे आगे क़तार में लगे लोगों की संख्या का जायजा लिया था। उसके बाद वह एक बार फिर अपने साथ था...

... अस्पताल में बूढ़े के बेटे की देर तक जाँच पड़ताल चलती रही थी। बूढ़ा, उसकी पुत्रवधू, उसका पोता अस्पताल के बरामदे में खड़े-बैठे व्याकुल थे और प्रतीक्षा कर रहे थे कि डॉक्टर उन्हें आकर बताये कि पेशेंट अब ठीक है और उसे वे घर ले जा सकते हैं। ...परंतु शाम होने को आ रही थी, पर डॉक्टर ने उसके पास आकर अभी तक कुछ नहीं बताया था। उस दिन बूढ़े को अहसास हुआ था कि 'होश और आवाज़ गँवाये हुए किसी मरीज़ की स्वस्थ आवाज़ सुनने की आकुल प्रतीक्षा, उस मरीज़ के परिजन के लिए कितनी कष्टदायी और बेचैनकुन होती है! समय का एक-एक पल भारी हो रहा था उनके लिए। पर वे बेचैनकुन अगर आशा भरी प्रतीक्षा के साथ थे...

और अचानक डॉक्टर आकर उनके सामने था। डॉक्टर की ओर देखते हुए बूढ़े की आँखों में उम्मीद की लौ दिपदिया उठी; उसकी पुत्रवधू और पोता भी डॉक्टर की ओर ही देख रहे थे।

डॉक्टर ने उन्हें बड़े सहज आरै सपाट शब्दों में बताया था, ''पेसेंट कोमा में चला गया है... ब्रेन हेमरेज के कारण...’’

''कोमा में...!’’ बूढ़े के मुंह से निकला और उसने डॉक्टर की तरफ़ देखा था, ''तो फिर... अब...?’’

''देखते हैं, जो भी कर सकते हैं....’’ कह कर डॉक्टर चला गया था। उसके पीछे वहाँ छूट गया था एक सन्नाटा और शून्य। शून्य, जिसके भीतर ख़ालीपन के अलावा और कुछ भी नहीं होता।

बूढ़े को आज तक याद है कि वह एक शब्द कितना अँधेरे से भरा और डरावना लगा था उस दिन - ''कोमा’’!

...और फिर उस दिन के बाद डेढ़ बरस - यानी अठारह महीने बीत गये; पर बूढ़े का बेटा कोमा से बाहर नहीं आया था! वह अस्पताल के बिस्तर पर ही था - निष्चेष्ट, आँखें बंद किये, चुपचाप, अपनी दुनिया से पूरी तरह टूटा हुआ, एक अँधेरे से भरी दुनिया में खोया हुआ! बूढ़े को लगता था कि बीते आठारह महीने, महीने नहीं, गोया अठारह युग थे - अँधेरे में डूबे अठारह युग!... बीते अठारह महीनों में कितना-कुछ बदल गया था बूढ़े के घर-परिवार में... इस बीच, बूढ़े की, कुशल नृत्यांगना पुत्रवधू जैसे अपना नृत्य-कौशल भूल कर दर्द की प्रतिमूर्ति बन गयी थी - 'मोहिनीअट्टम’ जैसे उसकी देह और भंगिमा से छिटककर दूर चला गया था - उसका पूरा समय घर और अस्पताल के बीच की आवाजाही में खप गया था! बूढ़े का, फ्लूटिस्ट बनने की चाहत से भरा पोता बाँसुरी को जैसे भूल ही गया था! उसकी बांसुरियाँ बैग से बाहर न आई थीं। वह स्कूल ज़रूर जाने लगा था; किंतु स्कूल से लौटने के बाद का उसका पूरा दिन उसके पिता के बिस्तर के पास ही गुज़रता था - वह जैसे खुद से ही दूर हो गया था! और खुद बूढ़े ने इस बीच नाटक के मंच पर पैर नहीं रखा था। वह अपना ज़्यादातर समय अपने बेटे के पास गुज़ारता था। अलबत्ता वह अपने भीतर के ख़ालीपन को नाटक के वल्र्ड क्लासिक्स पढ़ते हुए भरता रहता था! उसका रंग-मंच उसके भीतर समा गया था - वहीं मंचित होते थे उसके नये नाटक-एक के बाद एक-वे नये नाटक, जो बीते अठारह महीनों के अँधेरे से बावस्ता थे... बूढ़े के ज़ेहन में बार-बार पुलिस-थाने के दारोग़ा का 'संवाद’ गूँजता था... मेडिको-लीगल-केस होने के कारण अस्पताल-प्रशासन की सूचना पर पुलिस ने एफ.आई.आर. तो फाइल कर ली थी; पर उसके आगे कुछ नहीं हुआ था... बूढ़ा बीच में एक-दो बार थाने दरया$फ्त करने पहुंचा था; तो एक दिन दरोगा बोला था, ''अब हद हो गई यार!... बार-बार चले आते हो यहाँ - क्या हुआ?’’ ''क्या हुआ?....’’ पहले सावधानी बरती नहीं कि वीआईपी मूवमेंट के समय अपने-आप को थोड़ा बचा कर चलें... और अब...!’’ दारोग़ा के मुँह से यह सुनकर बूढ़े के भीतर जैसे पलीते में आग सुलग उठी थी, ''वीआईपी?... किसने बनाया वीआईपी...?’’ उसने दारोग़ा की आँखों में आँखें डाल कर कहा था, ''और वीआईपी का मतलब क्या होता है?... वीआईपी का मतलब क्या आदमखोर होता है, जिससे खुद को बचा कर चला जाय?’’ सुनकर दारोग़ा ने चंद पलों तक बूढ़े को घूरा था, फिर कहा, ''नहीं चले, तो अब भुगतो!... और जाओ यहाँ से...!’’ बूढ़ा जानता था कि आम आदमी के लिए पुलिस का चेहरा ऐसा ही होता है!... उस दिन के बाद वह फिर कभी पुलिस थाने नहीं गया था!... उसे हर तरफ अँधेरा ही अँधेरा नज़र आता था; और उसके भीतर सवालों की एक लंबी क़तार आकर खड़ी होती रहती थी; मसलन, क्यों है यह हर तरफ अँधेरा?... कौन है इस अंधेरे का ज़िम्मेदार? - जैसे सवाल! गाहे-ब-गाहे उन सवालों में से कुछ के जवाब भी उसे मिल जाते थे - अपने भीतर से ही। तब वह बेचैन हो उठता था....