Barsaat ki wo kali raat - 1 in Hindi Horror Stories by सिद्धार्थ रंजन श्रीवास्तव books and stories PDF | बरसात की वो काली रात - (भाग - 1)

बरसात की वो काली रात - (भाग - 1)

अविनाश जब घर से निकला था तो उसे इस बात का ज़रा भी अंदाजा नहीं था की मौसम इस कदर बिगड़ जायेगा और ऐसा तूफान आ जायेगा की उसकी ज़िन्दगी पूरी तरह बदल जाएगी।

04 जुलाई 2021 का दिन यूँ तो सुहाना था, सुबह से आसमान बिलकुल साफ था और सूर्य देव खुश यूँ चमक रहे थे मानो आज कई दिनों बाद खूब रगड़ के नहा के आये हो। 10 बजे तक गर्मी इतनी बढ़ चुकी थी की घर से बाहर निकलना मुश्किल था, अविनाश को आज ही अपने मामा के घर जाना था क्यूंकि कल उनके घर में शादी थी। चूंकि अविनाश के मामा का घर उसके शहर से मात्र 200 किलोमीटर की दूरी पर था तो अविनाश ने अपनी बाइक से जाने का निर्णय किया था। अविनाश की माँ चाहती थी की अविनाश कल सुबह उसके और अविनाश के दूसरे मामा के साथ ही चले लेकिन अविनाश थोड़ा पहले जाके एन्जॉय करना चाहता था और अपनी माँ को कहता है कि आप सुबह मामा के साथ ही गाड़ी से आना मैं आज ही बाइक से निकल जाऊंगा। गर्मी ज्यादा होने की वजह से अविनाश की माँ ने कहा की शाम को निकल जाना क्यूंकि आज धूप बहुत तेज़ है। अविनाश भी इस बात से सहमत हो गया।
शाम को तकरीबन 4 बजे अविनाश अपनी बाइक रॉयल एनफील्ड क्लासिक से मामा के शहर जाने के लिए तैयार होता है। अपना सामान एक छोटे से बैग में रख कर बैग बाइक के पीछे बांध लेता है और अपनी माँ से विदा लेकर घर से निकल जाता है। अभी घर से 50 किलोमीटर दूर ही आया होगा कि आसमान में बादलों की हल्की हल्की आवा जाही शुरू हो चुकी थी। अविनाश ने बादलों को देख कर सोचा चलो आज बादल आने शुरू हो गए है गर्मी से कुछ राहत हो जाएगी लेकिन अविनाश ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा की ये "बादल" उसकी जिंदगी "बदल" देने वाले है।

अविनाश हाईवे पर 60 की स्पीड में बाइक भगा रहा था और अब शहर से इतना दूर आ चूका था की सड़क के दोनों तरफ सिर्फ खेत और मैदान ही नज़र आ रहे थे। मुश्किल 10 किलोमीटर और चला होगा कि बादल अब इतने बढ़ने लगे थे कि फ़िज़ा में अंधेरा छाने लगा था, सामने घनघोर काली घटा किसी कालजई राक्षस की तरह उसकी तरफ बढ़ा आ रहा था। ऐसा लग रहा था मानो धरती के सीने को फाड़ते हुए अहीरावण-महिरावण उसकी तरफ बढे चले आ रहे हो और उसे अपने साथ पाताल ले जाने को आतुर हो। अविनाश उन बढ़ते बादलों को देख कर सोच में पड़ गया कि आज तो बुरे फसें, जब घर से निकला था तो इतना साफ मौसम था इसीलिए रेन कोट भी साथ नहीं लिया। अविनाश को डर था कि अगर बारिश हो गयीं तो वो भीग जायेगा लेकिन उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि बारिश का इरादा सिर्फ उसे भिगोने का नहीं था।
बादल इतनी तेज़ी से बढ़ रहे थे कि कुछ ही देर में घनघोर अंधेरा छा गया और हल्की हल्की बुँदे भी गिरने लगीं। कुछ ही देर में बारिश कि बौछारों ने वर्षा का रूप धारण कर लिया, अविनाश ने बारिश से बचने के लिए एक पेड़ के निचे बाइक खड़ी कर दी। अविनाश ने दूर दूर तक नज़र दौड़ाई लेकिन कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था, ना कोई घर, ना कोई ढाबा बस एक यही पेड़।
अब बारिश के साथ साथ कड़ाके की बिज़ली भी चमक रही थी और बिजली की गड़गड़ाहट भी विकराल रूप ले रही थी। ऐसा लग रहा था मानो स्वम् इंद्र देव अपने एरावत और माँ दुर्गा अपने सिंह के साथ युद्ध कर रहे हो। कभी सिंह और एरावत के चिंघाड़ने की आवाज़ तो कभी बज्र और पिनाक के टकराने से उत्पन्न होने वाली भयानक ऊर्जा से भरी हुई बिजली। कभी कभी तो ऐसा लग रहा था ये बिजली धरती पे गिर कर सब कुछ नाश करना चाहती हो। अविनाश ने आस पास नज़र दौड़ाई उसे कुछ नज़र नहीं आ रहा था, उसके दिल में इस तूफ़ान ने डर उत्पन्न जरूर दिया था। बारिश और बढ़ती जा रही थी, बिजली की रौशनी में अविनाश ने देखा वो जिस पेड़ के निचे खड़ा था वो शायद बरगद का एक विशाल पेड़ था जिसकी शाखाएं सड़क तक आ पहुँची थी। अविनाश को कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करें, इतने भयंकर तूफ़ान में पेड़ के निचे खड़े रहना भी सुरक्षित नहीं था क्यूंकि पल पल कौंधती बिलजी किसी भी पल पेड़ पर गिर सकती थी। अविनाश आस पास आशा भरी निगाहों से देख रहा था की उसे कोई ऐसा आश्रय मिल जाये जहाँ तूफ़ान शांत होने तक सर छुपा सके। अचानक उसकी नज़र सड़क के दाहिने ओर दूर कही जलती हुई एक हल्की से रौशनी पर पड़ी, उसने अपने चेहरे पर बह रहे पानी को अपने हाथों से ठीक से पोछा ताकि उसे अपनी आँखों पर विश्वास हो सके। उसने देखा अभी भी एक हल्की सी रौशनी उस ओर से आ रही थी, अविनाश ने सोचा अभी तक उसे ये रौशनी क्यूँ नहीं दिखी थी? क्या उसकी आँखों को कोई भ्रम हो गया था? या घबराहट और डर की वजह से उसका ध्यान उस ओर नहीं गया? या फिर वो रौशनी अभी अभी वहाँ जली हो?
बहरहाल कारण जो भी हो, कारण से ज्यादा इस समय अविनाश के लिए निवारण जरुरी था। अविनाश ने निर्णय किया वो उस रौशनी का तरफ जायेगा शायद किसी का घर है वहाँ जहाँ उसे सर छुपाने को कुछ देर के लिए समय मिल जाये। अविनाश फिर से बाइक पर बैठता है और बाइक स्टार्ट करते है लेकिन काफ़ी कोशिश करने के बाद भी बाइक स्टार्ट नहीं हो पाती। "इस क़म्बख्त को भी अभी धोखा देना था।" अविनाश बाइक पर पैर मर कर बड़बड़या। उसने एक बार फिर से कोशिश की, बाइक के इंजन ने हल्का सा स्टार्ट लिया तो उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयीं लेकिन ये मुस्कान अगले ही पल गायब भी हो गयीं। बाइक में पठाखे फूटने जैसे एक आवाज़ हुई और इंजन से धुआँ निकलने लग गया। अविनाश बाइक से थोड़ा पीछे हट गया, कुछ ही पल में धुआँ निकलना बंद हो गया। अविनाश ने एक बार फिर कोशिश की पर इस बार बाइक किसी मुर्दे की तरह ठंडी पड़ी रही, उधर बादलों की गर्जन और तड़पन बढ़ती ही जा रही थी। एक दो बार तो ऐसा लगा जैसे बिजली अभी उस पेड़ पर गिर कर सब कुछ जला कर ख़ाक कर देगी।

अविनाश के चेहरे पे निराशा के भाव आ गए लेकिन अगले ही पल उसके डर ने उसे निराशा को त्याग कर उस आशा की किरण की तरफ सोचने को मजबूर कर दिया। अविनाश ने घड़ी में समय देखा 7 बजने को आये थे, उसने बाइक से अपना बैग लिया और कंधे पर टांग लिया। अब अविनाश पैदल ही उस रौशनी की तरफ बढ़ने लगा।
बारिश इतनी तेज़ थी की सड़क के आस पास काफ़ी पानी इकट्ठा होने लगा था, लेकिन अविनाश ने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया था। यहाँ पेड़ के निचे खड़े होकर बिजली से मरने से तो अच्छा है की उस रौशनी की तलाश में जाया जाये, हो सकता है वहाँ कोई आसरा मिल ही जाये। तकरीबन 15-20 मिनट पैदल चलने के बाद उसे अब वो रौशनी बिलकुल साफ दिखाई देने लगी थी, यानि एक बात तो तय थी की वहाँ कोई घर जरूर है जहाँ से ये रौशनी आ रही थी। बारिश के पानी भर जाने की वजह से कदम बढ़ाने में काफ़ी दिक्कत हो रही थी अन्यथा उस रौशनी तक पहुँचने में अविनाश को पैदल सिर्फ 15 मिनट ही लगते। अब अविनाश को वो घर भी साफ दिखना शुरू हो गया था जहाँ से रौशनी आ रही थी, लेकिन रौशनी अभी भी धीमी ही थी। उस घर के आलवा वहाँ और कोई घर नहीं दिख रहा था, ये देख कर अविनाश को थोड़ा अजीब भी लगा लेकिन इसके अलावा उसके पास और कोई चारा भी नहीं था।

अविनाश अब उस घर के काफ़ी करीब पहुँच चूका था, उसने देखा एक पुराना सा मकान है जिसकी दीवालें बता रही थी की कई ज़माने से उनपे रंगाई पुताई नहीं कराई गयीं है। घर के आस पास कुछ नहीं था, सिर्फ खेत और घर के पीछे कुछ ही दूरी के बाद एक जंगल की शुरुआत होती थी। अविनाश यही सब देख कर ठिठक गया, इतने वीरान में कोई भला क्यूँ रहता होगा? आस पास ना कोई घर है ना कुछ और? और वो भी जंगल से इतना नज़दीक? "हो सकता है जंगल का रेंजर यहाँ रहता हो जंगल के भी नज़दीक है और सड़क से भी ज्यादा दूर नहीं " अविनाश के अंतर्मन ने उसे समझाया, अविनाश को कुछ हिम्मत आयी और वो घर के करीब गया। यह क्या? घर सिर्फ बाहर से ऐसे ही बंद है, कोई ताला नहीं।
"हो सकता है उसे लॉक करने को जरुरत ही महसूस ना होती हो? कौन आता होगा यहाँ वीरने में" अविनाश के अंतर्मन ने एक बार फिर से समझाया
"हाँ शायद थम सही कह रहे हो, एक बार आवाज़ दें कर देखता हूँ।" अविनाश ने अपने अंतर्मन से कहा
अविनाश कर दरवाजे की कुण्डी खटखटाता है और एक दो बार आवाज़ भी लगता है लेकिन अंदर कोई नहीं होता है इसलिए कोई जवाब नहीं मिलता।
"क्या मूर्खों वाली हरकत कर रहा है अविनाश? जब दरवाजे की कुण्डी बाहर से बंद है तो अंदर कोई कैसे हो सकता?" अविनाश के अंतर्मन ने उसे धिक्कारते हुए कहा
"बात तो तू सही कहा रहा है, दरअसल इस तूफ़ान ने मुझे इसकदर डरा दिया है की मैं कुछ सोच समझ ही नहीं पा रहा हूँ।" अविनाश ने अपनी सफाई में कहा
"अब खड़ा खड़ा क्या सोच रहा है? इस बारिश में अभी और भीगने का मन है क्या?" अविनाश के अंतर्मन ने सवाल किया
"नहीं, लेकिन क्या करुँ जब घर पे कोई नहीं है?" अविनाश ने जवाब दिया
"क्या मतलब घर पे कोई नहीं है? तू क्या यहाँ रिश्तेदारी निभाने आया है? घर पे कोई नहीं है लेकिन घर तो खुला है, दरवाजा खोल कर अंदर जा और बाहर कमरे में ही बैठ जा जब तक कोई नहीं आता। जब कोई आएगा तो उसे अपनी सारी परेशानी बता देना कि कैसे तुम यहाँ आये।" अविनाश के अंतर्मन ने समझाते हुए कहा
"शायद तुम सही कह रहे हो, सामने वाले को मेरी मज़बूरी समझ आ जाएगी। इस बारिश में और कही सर छुपाने को है भी तो नहीं।" अविनाश ने सहमति जताई
अविनाश दरवाजे को खोल कर अंदर चला जाता है, अंदर जाकर अविनाश देखता है एक बड़े से हाल कमरे में एक धीमी लौ से लालटेन जल रही थी। उसने अपना सामान वही कोने में रख दिया और आगे बढ़ कर लालटेन कि लौ तेज़ करी। अब कमरे में भरपूर रौशनी थी उसने देखा कमरा काफ़ी बड़ा और खूबसूरत था, घर जैसा बाहर से देख कर खंडहर लग रहा था अंदर से बिलकुल उसके विपरीत था। कमरे कि सजावट कुछ ऐसी थी जैसे वो किसी होटल में आ गया हो, अविनाश ने फिर एक दो बार आवाज लगाई लेकिन किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया। अविनाश ने बैग में से सूखे कपड़े निकाले और गीले कपड़े बदल लिए, गीले कपड़ों का पानी निचोड़ कर उसने उन्हें एक पॉलीबैग में रख किया और बैग में डाल दिया। अब अविनाश को काफ़ी अच्छा महसूस हो रहा था, पास ही पड़ी आराम कुर्सी पर जाकर अविनाश बैठ गया। अब अविनाश को इंतज़ार था बारिश रुकने का, अगर मकान के मालिक के आने से पहले बारिश रुक जाती है तो वो बिना बताये निकल जायेगा।

बारिश में बुरी तरह भीगने कि वजह से अविनाश थक सा गया था, उसने कमर कुर्सी से टिका दी और उसे पता ही नहीं चला कब उसकी आंख लग गयीं। अचानक घर के अंदर बर्तन गिरने कि आवाज़ हुई जिससे अविनाश कि आँख खुल गयीं, अविनाश झटके से उठ कर कुर्सी से खड़ा हो गया। उसने देखा बाहर का दरवाजा खुला हुआ था, उसे लगा शायद मकान का मालिक वापस आ गया है।
"ये आवाज़ कैसी थी? ऐसा तो नहीं उसने मुझे चोर समझ लिया हो और अंदर से कोई हथियार लाने गया हो?" अविनाश ने खुद से सवाल किया
"इससे पहले कि तेरे शरीर के टुकड़े हो यहाँ से भाग जाने में ही तेरी भलाई है।" अविनाश के अंतर्मन ने आगाह किया
"अरे मैंने कोई चोरी थोड़े ना की है, एक बार बात तो करने दो।" अविनाश ने खुद को समझाया
"कोई है? सर मैं घर में बिना बताये अंदर आ गया क्यूंकि घर खुला हुआ था। मेरा इरादा चोरी का नहीं था मैं बहुत भीगा हुआ था और आस पास कोई भी जगह नहीं थी जहाँ खुद को बारिश से बचा सकता इसलिए मैं आपके घर में आ गया।" अविनाश ने अपनी जगह पर खड़े खड़े अपनी सफाई में कही।
अंदर से कोई जवाब नहीं मिला, अविनाश ने एक बार फिर कोशिश की।
"सर मेरा इरादा परेशान करने का नहीं था मैं मजबूरी में अन्दर आ गया था। तूफ़ान कम होते ही यहाँ से चला जाऊंगा, मेरी बाइक भी ख़राब हो गयीं है इसलिए मुझे यहाँ आना पड़ा।" अविनाश ने फिर कहा
इस बार भी उसे कोई जवाब नहीं मिला।
"कोई जवाब क्यूँ नहीं दें रहा?" अविनाश ने सवाल किया
"अंदर जाकर देखना चाहिए।" अविनाश के अंतर्मन ने कहा
"मुझे डर लग रहा है।" अविनाश ने कहा
"मैं हूँ ना तुम्हारे साथ।" अविनाश के अंतर्मन ने दिलासा दिया
अविनाश के अंदर कुछ हिम्मत जगी, उसने लालटेन हाथ में उठाई और अंदर की तरफ धीरे धीरे बढ़ने लगा। हाल कमरे को पार करते हुए अविनाश अंदर गैलरी में पहुँच गया, अंधेरा होने और दिल में डर होने के कारण अविनाश धीरे धीरे कदम बढ़ा रहा था। लालटेन की रौशनी में सबकुछ उतना साफ नहीं दिख रहा था, गैलरी को पार करते ही अविनाश को दो बड़े कमरे दिखे जिसमे से एक तो बड़ा सा किचन था और दूसरा एक बड़ा सा बैडरूम था। बैडरूम बाहर से लॉक था लेकिन किचन का दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था, किचन की पिछली ओर शायद एक और दरवाजा था जो पीछे बने एक छोटे से आँगन में खुलता था जिसका एक दरवाजा शायद उस बैडरूम से अटैच था। अविनाश ने किचन में जांचने का फैसला किया, वो दबे पाव से आगे बढ़ा और किचन के दरवाजे को हल्के से धक्का दिया। दरवाजे के खुलते ही जो उसकी नज़रो ने देखा उससे अविनाश के होश फाख्ता हो गए।

To be continued...


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