Tash ka aashiyana - 30 in Hindi Fiction Stories by Rajshree books and stories PDF | ताश का आशियाना - भाग 30

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ताश का आशियाना - भाग 30

जैसे ही सुबह हुई, तुषार की नींद खुल गई।
उसने एक बार फिर सिद्धार्थ को देखा।
उठ भी जाओ अभी रागिनिजी आपकी ही है।
बस उठ जाओ, बहुत सारे प्रोजेक्ट बाकी है।
भूल गए क्या? आप शादी लायक लड़की धुडंकर देने वाले हो मुझे, वादा किया है ना आप ने बड़ी मां से।
तुषार के आंखो से आसू टपक गया जो सिद्धार्थ के हाथो को गीला कर दिया।

वो बिना और कुछ बोले बाथरूम में चला गया।
वो हिम्मत नहीं हारेंगा यही सोच रख उसने अपने आंखो को पानी से साफ किया।
बाहर आया तो नर्स आइवी बदलने आई थी।
"सिस्टर!" नर्स पीछे मुड़ी।
"कब तक भाई ठीक होगा।"
"वो उनके होश में आने पर है। वो एक हाई मेडिटेशन पर है डॉक्टर से आप पूछ ली जायेगा।"
तुषार ने कुछ सोच अपनी गर्दन हिलाई।
"सिस्टर में चाय पीने जा रहा हु, आप भाई का ख्याल रखिएगा।"
सिस्टर ने हा में सिर हिलाया और हा, समझ तुषार वहा से चला गया।
तुषार चाय पीने वही के हॉस्पिटल, के टपरी पर आ गया।
बाजू में ही समोसे बिक रहे थे।
उसने हाफ प्लेट समोसे का ऑर्डर दिया।
ऑर्डर देकर वो जैसे ही चाय के साथ समोसा खा रहा था की उसका फोन बज उठा।

"हेलो तुषार कहा हो?"
फोन प्रतीक्षा का था, "में कब से फोन कर रही हू।"
"हॉस्पिटल में।"
"क्यो!? क्या हुआ?" प्रतिक्षा हड़बड़ा गई।
"एक्सीडेंट।"
"तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ है, क्या हुआ तुम ठीक तो हो?"
"नही, भाई का।" तुषार के आवाज में कंपन भर गया।
"सिद्धार्थजी का एक्सीडेंट हुआ है?"
"क्या हुआ सिद्धार्थ को?"
यह आवाज रागिनी की थी। रागिनी ने झट से फोन अपने हाथ में लेकर अपनी बात रखी।
"कल भाई निकले थे बाहर तो हाइवे पर उनका एक्सीडेंट हो गया।"
"कैसे? तुमने उसे जाने क्यों दिया?" रागिनी के बातो मे पीड़ा झलक उठी।
"तुम्हारे उस स्टंट के कारण हुआ है यह, हा!"
"रागिनीजी!" तुषार रागिनी के गुर्राने से डर गया।
रागिनी गुस्से में कहराते हुए बोल उठी, "एड्रेस सेंड करो मुझे।"
"हा करता हु।"
तुषार ने बिना कुछ आगे बात बढ़ाए, मैसेज सेंड कर दिया।
रागिनी से बात करने के बाद उसका समोसा खाने का मूड उतर गया। उसने बस, बाद के लिए एक पॉलीथिन मांगी और समोसे पैक कर लिए।
उसके कदम एक बार फिर हॉस्पिटल के तरफ बढ़ गए।
उसके अंदर खुदके के लिए गुस्सा भर चुका था।
उसे नही पता था ऐसा कुछ हो जायेगा।
सिद्धार्थ के मां की बात मानना, उनके शादी के प्लान में शामिल होना उसे खुदकी सबसे बड़ी गलती लग रही थी।
अगर सिद्धार्थ को कुछ हुआ तो वो खुदको कभी माफ नहीं कर पायेगा।
तुषार ने ठान लिया की अब वो गंगा के किसी बात के लिए हामी नहीं भरेगा, वो उसके भाई को, सिद्धार्थ को खुदके फैसले खुद लेने देंगा l

तुषार एक बार फिर सोफे पर जाकर बैठ गया।
आने जाने वाले विजीटर्स को देख रहा था।
वहा के एक महिला विजीटर्स ने खाना भी ऑफर किया पर वो उसने ठुकरा दिया। आग्रह करने पर थोड़ा उपमा उसने खाया।
बस कुछ देर बात पेशेंट्स से बातचीत कर वो भी चले गए। सिर्फ पेशेंट की वाइफ वहा बैठी थी।
पेशंट की वाइफ से बातचीत करने पर बस इतना पता चला उनके पति को किडनी फेल्योर हुआ है जिसका कल ही ऑपरेशन हुआ है।
उसे खाना खिलाने का आग्रह करने वाली पेशेंट की मां थी और खाना परोसने वाली पेशेंट की वाइफ।
उसी में कही, रागिनी ने वहा दस्तक दी उसके साथ प्रतीक्षा भी थी।
रागिनी की नजर तुषार पर गई। तुषार रागिनी को देखते ही मानो घबरा सा गया, क्या जवाब दे वो रागिनी को।
"कैसे हुआ यह सबकुछ?"
"डॉक्टर कह रहे थे,मेडिसिन का ओवरडोज हुआ है, मिल स्किप हो रहा था।" तुषार एक एक वाक्य मानो जीवा(tounge) पर कोयला लेकर बोल रहा था।
आसू मानो बाहर आने के लिए धधक रहे हो।

रागिनी यह सुनके हाल भी कुछ ऐसा ही था। वो भी पागलों की तरह रोकर अपना शोक और आक्रोश व्यक्त करना चाहती थी। पर उसका मस्तिष्क अभी भी अपने आजू-बाजू की परिस्थिति से अलर्ट था।
उसके दात पीसने लगे, आंखो से गरम गरम आसुओं की धारा बहने लगी।
जाने अनजाने में ही सही वो सिद्धार्थ के हालात के लिए खुद को दोषी समझने लगी।
"गलती कर दी तुमने, बहुत बड़ी गलती।" उसका मन चिल्ला–चिल्ला कर उसे बोल रहा था।
उसका मन छटपटा रहा था, सिद्धार्थ को गले लगाकर उसे माफी मांगने के लिए। उसे खुदमे छुपाने के लिए ताकि उसे कोई बुरी नजर ना लगे।
अपने मतलब के खातिर उसने सिद्धार्थ के बारे में तक सोचने की कोशिश नही की।
भले ही किए काफी विचित्र लगे लेकिन,
अपने व्यक्ति को हुई छोटी सी पीड़ा के लिए मन खुदको ही दोषी मानने लगता है।
यह सबकुछ वो रोक नही पाया इस बात का आक्रोश और अगर वही गलती खुदकी हो तो फिर मन
आत्मग्लानि (remorse) से भर जाता है।

रागिनी के मन में तो दोनो तरह की भावनाए गोते खा रही थी, आक्रोश और रिमोर्स दोनो।
रागिनी वहां रखें स्टूल पर जाकर बैठ गई। उसने सिद्धार्थ के हाथों को अपने हाथ में लिया।
"आई एम सॉरी! आई एम सॉरी!"
धीरे धीरे उसका लगाव प्रेम में बदल चुका है, यह बात वो जान चुकी थी।


दूसरी तरफ प्रतीक्षा काफी अव्यवस्था की स्थिति में फंस चुकी थी किसे संभाले पहले उसे पता नही चल रहा था।
एक तरफ रागिनी थी जो आई एम सॉरी, आई एम सॉरी का मंत्र जाप रही थी, वही दूसरी तरफ तुषार भी अपने तरीके से शोक मना रहा था।
उसके आंखों के किनारे में पानी भर चुका था, उसने दिलासा देने के लिए तुषार के पीठ को सहलाया।
तुषार को इस बात की कब से जरूरत थी ताकि कोई आए और उसे यह बताएं कि यह सब कुछ बहुत जल्द ठीक हो जाएगा।
रागिनी के माइंड के जैसा अलर्ट तुषार का माइंड नहीं था।
तुषार ने झट से प्रतीक्षा को गले लगा लिया, इसमें पहले तो प्रतीक्षा अचंभित और विचलित हो गई।

लेकिन तुषार को ऐसा रोते देख मानो बस वह छोटे
बच्चे जैसे उसे सहलाने लगी।
शोक में रोते वक्त कंधा थोड़ी देखा जाता है।
"डॉक्टर ने क्या कहा कब तक होश आयेगा सिद्धार्थ को?" रागिनी की आवाज आसुओं के कारण कर्कश सुनाई दे रही थी।
"तुषार ने जवाब दिया पता नही, कल रात से यह हादसा हुआ है तबसे होश में नहीं आए है।" रागिनी को जवाब मिलते ही मौहल में शांति फैल गई।

" क्या हुआ सिद्धार्थ जी को।" प्रतीक्षा ने कंफ्यूजन में तुषार से सवाल दागा।
" भाई प्रोजेक्ट के चलते खुदका ध्यान नहीं रख रहे थे, उन्होंने अपना ख्याल नही रखा और खुदको ठीक रखने के लिए ज्यादा मेडिसिन का ओवरडोज ले लिया।"
"मेडिसीन, कौनसी बीमारी की।"
"स्किज़ोफ्रेनिया!"
" स्किज़ोफ्रेनिया, वो दिमागी बीमारी?"
" हा।"
यह सुनते ही मानो, प्रतिक्षा के रोम–रोम में कड़वाहट भर गई हो।
उसने सिद्धार्थ के लिए जो भी कल्पनाएं की थी जो भी धारणाएं बनाई थी वो पूरी तरह झूठी साबित हो गई थी।
और ऐसा होने से उसके मन में एक अजीब घृणा ने जन्म ले लिया था।

जैसा प्रतीक्षा के साथ हुआ यह अक्सर हमारे साथ भी होता है।
किसी के प्रति जब हम कोई धारणाएं बनाए चलते है अगर उसपर ठेस पहुंचे तो झुंझला जाता है हमारा मन।
फिर जो विद्रोह भरता है मन में वो सारी अच्छाई ले डूबता है।
सिद्धार्थ को प्रतीक्षा ने जिस रूप में देखा था उसकी आंतरिक सच्चाई इन सबसे परेह थी। इस बात से ही उसका मन रूखा हो गया था। सिद्धार्थ के गुणों को लेकर उसके मन में जो भी प्रेम उमड़ आ रहा था वो एक ही झटके में धूल गया।

पर रागिनी मानो तरस रही थी की, कब सिद्धार्थ अपनी आंखे खोलेगा।
सिद्धार्थ की आंखो में खुदके लिए वो चिंता वो प्यार वो फिरसे एकबार देखना चाहती थी।
तीनो अपने अपने अपने विचारो में गुम थे।


समय बीतता गया।
प्रतीक्षा ने तुषार से कहा, " मेरी आज पाच बजे की ट्रेन है।"
तुषार सिर्फ प्रतीक्षा की तरफ देख कर बोला, "अब तक एडिटिंग शुरू नही हुई है।"
प्रतीक्षा तुषार से बोली, "पर तीन दिन बाद, सबमिशन बंद हो जायेगा, यह मेरे लिए आखरी चांस है।"
रागिनी सब सुन रही थी, "तुम दोनो जाओ मैं यहा ठहरती हु।"
पहले तो तुषार ने ना–नही का पहाड़ा गाया लेकिन रागिनी की जिद और प्रतिक्षा की लाचारी के सामने वो हार गया।
प्रतिक्षा के लिए यह कंपटीशन जितना काफी जरूरी था, और यही परिस्थिति जानते हुए तुषार ने घुटने टेक दिए।

दोनो के जाते ही रागिनी सिर्फ सिद्धार्थ की तरफ देख रही थी।
वो अपने मन में ही आंतरिक संवाद कर रही थी, हम दोनो एक जैसे ही है सिद्धार्थ तुम मैं हु, मैं तुम।
काश मैं तुम्हे बता पाती, मुझे नही पता तुम क्या रिएक्ट करोगे, मुझे एक्सपेक्ट भी करोगे या नहीं लेकिन मैं अपने सच्चाई से भाग थोड़ी पाऊंगी।

काश मैने उस दिन फैसला लेते समय थोड़ा सोचा होता, मेरे साथ यह हादसा ना होता जिसके निशान में अभी भी लेकर घूम रही हो।

तुम्हारा जैसे कोई फ्यूचर नही वैसे मेरा भी नही।
तुम जैसे प्यार से भागते आए हो मैं भी वही करती आई हु।
माइकल भी तो एक झूठ ही है, सबसे बड़ा बोला गया झूठ।
हमारा अफेयर, वो कुंडली प्रोब्लम सब झूठ।
लेकिन माइकल के साथ शादी करने से सब सेट हो जाता। सब ठीक हो जाता लेकिन दुख यह है की मेरे मां–बाप खुद नही चाहते, मैं कभी खुश रहू।
उन्हे सच्चाई पता होने पर भी वो अनजान बन रहे है।
कितने तो भी लडको को ठुकरा चुकी हु मै, कितनी घमंडी हु ना!
मम्मी–पापा मानते है की मेरी शादी करवाकर मेरी सच्चाई छुप जायेगी।
थोड़ा दहेज ही तो देना है पर मेरी जिंदगी का क्या? जो किसके साथ बाटने में अनकंफर्टेबल हु।
वो यह मानना ही नही चाहते की मैं एक नॉर्मल लड़की नही हु।
वो बस खुदका बोझ हलका करना चाहते है।
और एक तरफ तुम हो, जो अनजाने होकर भी अपने से लगते हो।
तुम क्यों दूर भागते हो मुझसे, लेकिन मैं तुम्हारी आंखे भाप लेती हु।
क्यों खुदको रोक लेते हो तुम, जब मैं तुम्हारे लिए सब गवाने के लिए तयार हु।
तुषार ने मुझसे पूछा, क्या तुम्हारे लिए मेरे मन में सिंप्थी है।
क्या बताती में, उसे की माइकल के बाद तुम एक टारगेट हो एक सहारा हो जो मुझे इस दुनिया से बचा सकता है।
मैं कैसे बताऊं क्यों पागल हु मे तुम्हारे लिए।
तुम जिस डर से भाग रहे हो, उसी डर के साथ में जी रही हु। हा भले ही दोनो की रास्ते एक ना हो मंजिल एक ही है।
मैं खुश रहना चाहती हू सिद्धार्थ।
मैं खुदको अपनाना चाहती हू, खुलके जीना चाहती हू लेकिन वो तुम ही हो जो मुझे यह अहसास करवा सकते हो।
उठ जाओ सिद्धार्थ, अपना लो मुझे हमारे रिश्ते को।
रागिनी सिद्धार्थ का हाथ पकड़ मन में ही अपने संवादों का आदान प्रदान कर रही थी।
उठ जाओ अभी, गलती हो गई हमारी।
इतना कह कर उसने सिद्धार्थ के हाथो को चूम लिया। आंखो में आसू भर चुके थे।

::::::::::::::दूसरी तरफ:::::::::::::::::
तुषार और प्रतीक्षा एडिटिंग स्टूडियो में गए।
जाते वहा के मालिक से दोनों ने बात की।
मालिक के कहे अनुसार उन्हे 4 बजे यह स्टूडियो खाली करना था फिलहाल 2:00 बजे थे। अगले दो घंटे ही थे दोनों के पास।
"क्या यह कंपटीशन, मैं हार जाऊंगी।"
"बिलकुल नहीं, मैं कुछ करता हु।"
"तुमने वो कैमरा साथ लाया है। "
"हा लाया है, मैने कल रात ही बैग में भर कर रख दिया था।"
"अच्छा काम किया, अभी हम एडिटिंग करना शुरू करते है।"
कोई पंधरा मिनट बाद सारी सेटिंग्स हो गई।
और आखिरकार फिल्म चल पड़ी।
सीन्स पर सीन्स चलते गए, तुषार उसको बारीकी से एडिट करता गया। तुषार और प्रतीक्षा का काफी अच्छा गेट मेट जम चुका था।
2से तीन 3 बज गए थे।
"सुनो, तुमने खाना खाया।"
"हा! नही।" तुषार ने एंब्रेसेड भरा जवाब दिया।
प्रतीक्षा ने अपने, बैग से पलस्टिक का टिफिन निकाला
उसमे से एक सैंडविच निकाल कर तुषार को दिया।
"यह लो, यह खालो।"
"नही नही तुम खाओ।"
"मैने कहा ना खाओ मैं इतना थोड़ी खाऊंगी।"
"तुषार ने, सैंडविच का थोडासा बाइट लिया।"
"ओह मतलब अब तुम मेरी बात नहीं मानोगे।"
"मैने क्या किया?"
"मैने कहा ना यह पूरा खाओ, चाय पीने से सिर्फ पेट खराब होंगा।"
प्रतीक्षा के गुस्से और जिद के सामने वो हार गया आखिरकार उसने पूरा सैंडविच उठा ही लिया।
दोनो ने सैंडविच खाया।
तुषार के मन में प्रतीक्षा के प्रति एक बार फिर सॉफ्ट स्पॉट तयार हो गया।

आदमी को चाहिए क्या होता है कोई उसका ख्याल करे बस!
तुषार और प्रतीक्षा ने सैंडविच खाते ही, दोनो चार्ज हो गए।
उन्होंने अब पेस पकड़ ली थी, जो पेस विद्यार्थी परीक्षा के आखरी समय पकड़ते है।
आखिकार 4 बजे गए।
वहा मालिक आ गया।
"हो गया क्या काम, चार बजे तक का ही तय हुआ था।"
"हा बस थोड़ा समय और , मैंने आपको बताया था ना एक्सीडेंट के बारे में प्लीज थोड़ा समय दे दीजिए।"
"ठीक है ठीक है, जल्दी जल्दी काम निपटाओ।"
तुषार ने काम करना तो शुरू कर दिया था, लेकिन बीच में ही एक और परेशानी पैदा हो गई।
"अभी कितना समय बचा है।" प्रतिक्षा ने बैचानी में पूछा।
"अभी और 2 घंटे।"
"तुषार.... मेरी 5 बजे की ट्रेन है।"
तुषार ने प्रतीक्षा की तरफ देखा एकाएक उसका हाथ माउस पर से छूट गया।
उसके चेहरे पर हल्की सी निराशा छा गई।
प्रतिक्षा को अब पूरा यकीन था, वो यह कंपटीशन कभी नही जीत पाएगी। अब उसे आखिरकार पापा के बताए लड़के से ही शादी करनी होंगी।
तुषार ने प्रतीक्षा से बड़े ही सहानुभूति के साथ पूछा, "कब है सबमिशन की लास्ट डेट।"
"आज से दो दिन बाद।"
तुषार के चेहरे पर हसी खिल गई, "फिर ठीक है।"
"क्या ठीक है। "
"तुम यह कंपटीशन जरूर जीतोगी।"
"पर कैसे?" प्रतीक्षा के आंखो मे बेसब्री झलक उठी।
"मैं तुम्हे खुद यह फिल्म लाकर दूंगा।"
"पर..."
"डोंट वरी प्रतीक्षा, मुझ पर विश्वास रखो।"
प्रतिक्षा के आंखो में आसू आ गए।

लड़कियों में गुस्सा होता है, जुनून होता है, प्यार होता है, उत्साह होता है बस जबान नही होती। और जिन्हे होती है वो लड़किया नही होती।
लड़किया लड़के से ज्यादा नजदीकिया ना बढ़ाए यह हर मां बाप चाहते है, लेकिन आखिरकार एक अनजान लड़के से उसकी शादी करवा देते है। बिना उसकी मर्जी जाने। यह परंपरा सालो से चलती आ रही है जहा लड़की के सपने और जुबान कोई मायने नहीं रखती।

और अगर आज भी चलने वाली यह बात कल जाकर पूरी तरह खत्म हो जाए तो प्रतीक्षा जैसी हजारों कहानीया सिर्फ बड़े–बूढ़े के जहन में रहेगी या किसी लाइब्रेरी में धूल खाते हुए दिखाई मिलेंगी।

लेकीन आज प्रतीक्षा की कहानी जिंदा है, वो अपने सपने के लिए जी रही है, जिसका अंत उसपर और उसकी नीडरता पर निर्भर है।
उसने तुषार की बात पर मुस्कुराकर हा में सिर हिला दिया।

तुषार ने सीन की एक बेसिक एडिटिंग कर प्रतीक्षा को रेलवे स्टेशन तक भी छोड़ने का फैसला किया।
आखिरकार दोनो, रेलवे स्टेशन तक पहुंचे।

"अभी एडिटिंग में क्या बाकी है?"
"कुछ नहीं अभी सीन को मैंने एक बेसिक एडिट किया है। उसमें कुछ टाइमलाइन और लूप होल अगर हम कवर कर लेते हैं ले तो, फिल्म तयार हो जायेगी।"

"डोंट वरी, मैं तुम्हे वो खुद फिल्म लाकर दूंगा।"
"तुम खुद आओगे?"
"क्यों तुम्हे अच्छा नही लगेगा, अगर मैं आऊ तो?"
प्रतिक्षा मुसुकरा दी।
"Then I felt special."
तुषार शर्मा कर हस दिया, प्रतिक्षा भी हस दी।
"थैंक्स।"
"किसके लिए।" तुषार ने आश्चर्य जताया।
"तुम लोग आज नही होते, तो मैं खुदके इंडिपेंड्स की कीमत कभी नही जान पाती।"
हमेशा हर एक छोटी चीज के लिए पापा मेरे पीछे खड़े रहे लेकिन जब मेरे पीछे कोई नही था तब इस दुनिया को जानना अलग था।
इंदौर से यहां अकेले आने से लेकर, अपने सपने के लिए लड़ने से लेकर सबकुछ काफी स्पेशल था। मुझे लगा जैसे इन सात दिनों में मैने दुनिया जी ली।
"सो अब प्रतीक्षा, मैच्योर प्रतीक्षा हों चुकी है।"
"नही अभी मैच्योर होने की पहली स्टेप चढ़ी है।"
मैं इंडिपेंट होना चाहती हू। ताकि पापा मेरी अहमियत समझ पाए, पर उसके लिए मुझे खुद लढना होगा।

तुषार काफी खुश था।
"हर मर्द के कामयाबी के पीछे एक औरत का हाथ होता है और हर औरत के कामायाबी के पीछे मर्द की समझदारी होती है।"
आखिरकार प्रतीक्षा सीट पर जाकर बैठ गई।
"मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी।" प्रतिक्षा ने शर्माते हुए कहा।
तुषार ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं जरूर आऊंगा।"
आखिरकार ट्रेन चल पड़ी। और कुछ ही मिनिट में आंखो से ओझल हो गई। आंखो से गायब होते ही तुषार ने अपना रास्ता पकड़ लिया की तभी तुषार का फोन बजा।
"हेलो तुषार, सिद्धार्थ को होश आ गया है।"
यह सुनते ही मानो, तुषार के पैर भाग पड़े, हॉस्पिटल की और।

---------) सिद्धार्थ होश में आते ही खुदकी हालत देख जितना अचंबे में नही था उससे भी कही ज्यादा रागिनी को देखकर शॉक में था।
क्या रागिनी को उसके बारे में सच पता चल गया?
क्या उसे उसकी कमजोरी के बारे में पता चल गया?
क्या रागिनी का अफेक्शन अब खत्म हों जायेगा?
क्या वह भी अब उसे चित्रा की तरह छोड़ कर चली जाएगी?
क्या रागिनी अब उससे नफरत करने लगेगी?

यह सारी बातें उसके दिमाग में पहले आई, क्योंकि उसे यह तो पता था की, उसके बीमारी के कारण ही उसे एक बार फिर हॉस्पिटल का मुंह देखना पड़ रहा है।
पर रागिनी को वहां देख सिद्धार्थ का दिल डर से जोर-जोर से धड़कने लगा था।
" मर्द चाहता है, औरत उसे उसकी खामियों के साथ अपनाए पर उनके रिश्ते मे उन खामियों का जिक्र कभी ना हो।"

पर सिद्धार्थ की बीमारी ऐसी थी की खामियों को रोज रिश्ते में परोसा जाता, जो उसे कभी खुश नहीं रख पाती नाही उसकी अदर हाफ को।


अब उन दोनो के रिश्ते का भविष्य उन दोनो की समझदारी और किस्मत पर ही निर्भर था।