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पके फलों का बाग़ - 8
by Prabodh Kumar Govil

मुझे लग रहा है कि आपको पूरी बात बताई जाए। एक बार एक सेमिनार में बहुत सारे रिसर्च स्टूडेंट्स ने मुझसे पूछा कि जिस तरह से विज्ञान के क्षेत्र ...

पके फलों का बाग़ - 7
by Prabodh Kumar Govil

अनुवाद बहुत आसान है। कोई भी मैटर लो, फॉर एग्जांपल, "ये ज़िन्दगी उसी की है जो किसी का हो गया", ठीक है? अब हम इसे किसी अन्य भाषा में ...

હું કોણ છું?
by Shanti bamaniya

તમે કોણ છો ? તમારી પોતાની ઓળખ શું? પોતાની ઓળખ નો મતલબ શું છે.? શું ઘર-પરિવાર બાળકો અને સંબંધોથી જિંદગી પૂર્ણ નથી થતી? પોતાની જાતને જાણવું જરૂરી છે? પોતાની ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 20
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (20) इन दिनों कविता के प्रति रुझान तेजी से हो रहा था। कहानी दिमाग में आती ही नहीं थी। सुबह घूमने जाती ...

नरोत्तमदास पाण्डेय मधु जी का जीवन और व्यक्तित्व
by कृष्ण विहारी लाल पांडेय

ऽ नरोत्तमदास पाण्डेय मधु जी का जीवन और व्यक्तित्व नरोत्तमदास पाण्डेय ’’मधु’’ बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बुन्देलखण्ड के ऐसे कृती कवि हुए हैं जिन्होंने प्रभूत परिमाण में उत्कृष्ट ...

पके फलों का बाग़ - 6
by Prabodh Kumar Govil

आने वाला फ़ोन मेरे एक मित्र का था जो इसी शहर में एक बड़ा डॉक्टर था। उसने कहा कि उसे अपने एक क्लीनिक के लिए एक छोटे लड़के की ...

પડદા પાછળના કલાકાર - 4 - કાશ્મિરસિંગ . એક અંધકારયાત્રા : માતૃભૂમિ માટે
by MILIND MAJMUDAR

કાશ્મિરસિંગ અંધકારયાત્રા : માતૃભૂમિ માટે 2008, વાઘા અટારી બોર્ડર. લાહોર 28 કિલોમીટર અને અમૃતસર 27 કિલોમીટર. રેડક્લિફ નામના અંગ્રેજ ઓફિસરે 1947માં  દોરેલી સરહદરેખા આ બંને ગામોની મધ્યમાંથી પસાર થાય છે. હૈયેહૈયું ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 19
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (19) इतनी लंबी साहित्यिक यात्राओं के बाद मुझे काफी समय खुश रहना चाहिए था पर मेले की समाप्ति का सूनापन मेरे साथ ...

મુથુલક્ષ્મી - ઇતિહાસની અજાણી વીરાંગના
by SUNIL ANJARIA

ડો. મુથુલક્ષ્મી માટે કહી શકાય કે ખૂબ લડી મર્દાની થી, વહ મદ્રાસ કી રાની થી.1886 એટલે કે દોઢ સદી પહેલાં અત્યંત સંકુચિત દક્ષીણ ભારતીય રિવાજો વચ્ચે એક કુરિવાજ દેવદાસીનો ...

पके फलों का बाग़ - 5
by Prabodh Kumar Govil

मुझे अपने जीवन के कुछ ऐसे मित्र भी याद आते थे जो थोड़े- थोड़े अंतराल पर लगातार मुझसे फ़ोन पर संपर्क तो रखते थे किन्तु उनका फ़ोन हमेशा उनके ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 18
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (18) दिल्ली में मौलिक काव्य सृजन द्वारा कृष्ण काव्य सम्मान 20 अक्टूबर को मिलना था । कार्यक्रम के आयोजक सागर सुमन ने ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 17
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (17) सूने घर का पाहुना ज्यूँ आया त्यूँ जाव औरंगाबाद पहुंचकर प्रमिला से लिपट खूब रोई । सब कुछ खत्म । हेमंत...... ...

पके फलों का बाग़ - 4
by Prabodh Kumar Govil

मुझे रशिया देखने का चाव भी बहुत बचपन से ही था। इसका क्या कारण रहा होगा, ये तो मैं नहीं कह सकता पर मेरे मन में बर्फ़ से ढके ...

पके फलों का बाग़ - 3
by Prabodh Kumar Govil

क्या मैं दोस्तों की बात भी करूं? एक ज़माना था कि आपके दोस्त आपकी अटेस्टेड प्रतिलिपियां हुआ करते थे। उन्हें अटेस्ट आपके अभिभावक करते थे। वो एक प्रकार से ...

પડદા પાછળના કલાકાર - ૩
by MILIND MAJMUDAR

રંગમંચથી કારાગાર સુધી: રવિન્દ્ર કૌશિકશ્રી ગંગાનગર રાજસ્થાન મરુભૂમિથી ઘેરાયેલા આ નગરના ટાઉનહૉલમાં કોઈકનાટક ચાલી રહ્યું હતું. ચીનના  લશ્કરના હાથે જીવિત પકડાયેલા એક ભારતીય મેજર કોઈ પણ ગુપ્ત બાતમી આપવાનો ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 16
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (16) किसी से मिलना बातें करना, बातें करना अच्छा लगता है। लेकिन ज़िंदगी इतनी आसान कहाँ! वह तो वीराने में फैला हुआ ...

पके फलों का बाग़ - 2
by Prabodh Kumar Govil

लो, इधर तो मैं फ़िर से अपने गुज़रे हुए बचपन में लौट रहा था, उधर मेरे इस यज्ञ में घर के लोग भी आहूति देने लगे। मुझे मेरी बेटी ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 15
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (15) जब राजस्थानी सेवा संघ की स्वर्ण जयंती भाईदास हॉल में मनाई जा रही थी तब माया गोविंद और गोविंद जी से ...

મેરી કહાની મેરી ડિજિટલી ઝુબાની - ભાગ-૨ - ૦૨ ફેબ્રુઆરી ૨૦૨૦
by Manthan Thakkar

હેલો મિત્રો કેમ છો બધા? આજે ફેબ્રુઆરી મહિના નો પ્રથમ રવિવાર પણ એના કરતા પણ મહત્વની વાત એ આજ ની તારીખ ૦૨-૦૨-૨૦૨૦ કેટલી સરસ તારીખ છે નહિ એને આગળ ...

पके फलों का बाग़ - 1
by Prabodh Kumar Govil

बाग़ के फल अब पकने लगे थे। लेकिन माली भी बूढ़ा होने लगा। माली तो अब भी मज़े में था, क्योंकि बूढ़ा होने की घटना कोई एक अकेले उसी ...

जीवन जगण्याची कला - भाग 2
by Maroti Donge

    जीवन जगण्याची कला आहे आपण अंगीकारली पाहिजे. कारण आपल्यात असे प्रसंग येतात. त्यांचा आपण विचारही करू शकत नाही.         आजच्या जीवनात अनेक संकटे दिसतात. त्यांचा ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 14
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (14) इसी वर्ष नमन प्रकाशन ने सुरेंद्र तिवारी के संपादन में 20वीं सदी की महिला कथाकारों की 10 खंडों में कहानियां छापी। ...

પડદા પાછળના કલાકાર - ૨ - એક‌‌ સજ્જન જાસૂસ: રામેશ્વરનથ‌ કાઓ
by MILIND MAJMUDAR

        એક સજ્જન જાસૂસ : રામેશ્વરનાથ કાઓએનું અસ્તિત્વ છે છતાં પણ નથી અને નથી છતાં પણ છે.વાત છે દિલ્હીના લોદી રોડ પર  આવેલી એક ઇમારતની - ...

વેલવિશર
by Setu

                                વેલવિશર                  એક મંચ પર ઉભેલ અમે બે ખબર નહિ ક્યારે એકબીજાના જીવનભરના ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 13
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (13) थक चुकी थी। चाहती थी किसी शांत पहाड़ी जगह जाकर गर्मियां बिताऊँ। अपने अधूरे पड़े उपन्यास "लौट आओ दीपशिखा" को भी ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 12
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (12) आलोक भट्टाचार्य नवोदित लेखिका सुमीता केशवा की किताब एक पहल ऐसी भी का लोकार्पण हेमंत फाउंडेशन के बैनर तले कराना चाहते ...

तेरे शहर के मेरे लोग - 19 - अंतिम भाग
by Prabodh Kumar Govil

( उन्नीस - अंतिम भाग) मेरे पिता मेरे साथ बस मेरी पच्चीस वर्ष तक की आयु तक रहे, फ़िर दुनिया छोड़ गए। मेरी मां मेरे साथ मेरी तिरेसठ वर्ष ...

तिरुपति बालाजी का वो यादगार प्रवास
by Keyur Shah

नमस्कार मित्रों,मेरे जीवन में अब तक बहुत सारे अनुभव हुए हैं, जिन्हें याद करके मन रोमांचित हो जाता है, मैं इन अनुभवों को आपके साथ साझा करने का विचार ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 11
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (11) हेमंत की मृत्यु के बाद मेरी बर्बादी के ग्रह उदय हो चुके थे । मीरा रोड का घर हेमंत के बिना ...

मेरे घर आना ज़िंदगी - 10
by Santosh Srivastav

मेरे घर आना ज़िंदगी आत्मकथा संतोष श्रीवास्तव (10) चर्चगेट स्थित इंडियन मर्चेंट चेंबर का सभागार बुक कर लिया । शैलेंद्र सागर, विभूति नारायण राय, काशीनाथ सिंह, भारत भारद्वाज सब ...

પડદા પાછળના કલાકાર અજિત ડોવાલ: એક ઝલક
by MILIND MAJMUDAR

             પડદા પાછળના 'કલાકાર'            અજિત ડોવાલ: એક ઝલક   જૂઠું બોલે છે, સ્વાંગ રચે છે,કાવાદાવા કરે છે , ષડયંત્રો ઘડે ...

तेरे शहर के मेरे लोग - 18
by Prabodh Kumar Govil

( 18 )मैंने देखा था कि जब लोग नौकरी से रिटायर होते हैं तो इस अवसर को किसी जश्न की तरह मनाते हैं। ये उनकी ज़िंदगी के जीविकोपार्जन के ...