अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर कभी आरक्षण कभी रिश्ता, जाति,बिरादरी,क्षेत्र व भ्रष्टाचार ने टॉग खींच दिया, एक लाईन मे कहे तो अपनी किस्मत मे नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो वकील बन गये।