आलोक मिश्रा मनमौजी व्यंग्य , कहानी लेखक किसी परंपराओं नहीं मानता इसलिए रचनाऐं पारंपरिक श्रेणी में नहीं आती । मेरी रचनाऐं सोचने हेतु मजबूर करती है अधूरी लगती है । सभी अधूरे संवाद के अंतर्गत आती है । मेरी कहानीयाँ परंपरावादी नहीं है । पद्य का परंपरावाद अभिव्यक्ति को पूर्ण प्रवाह में बहने से रोकता है । वास्तव में मै साहित्यकार होने के अभिमान को भी न मानते हुए केवल अभिव्यक्ति करना चाहता हूँ । व्यंग्य प्रिय विधा है जो कहानियों में भी मिलेगा । कभी कभी ही सही परंपरावादियों को खुश करने का प्रयास रहता है