अंतिम ख्वाहिश

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जबसे कलावती बस्ती की ही अपनी एक सहेली की अंत्येष्टि से वापस आई थी बेहद गमगीन व भावुक नजर आ रही थी। लग रहा था जैसे वह गंभीरता से कुछ सोच रही हो। चेहरे के भाव ऐसे थे मानो वह कुछ कहना चाह रही हो और शब्द उसकी जुबान से न निकल पा रहे हों। उसकी अवस्था से चिंतित उसके पति धरमू की नजरें लगातार उसका निरीक्षण कर रही थीं। आखिर उससे रहा नहीं गया तो वह उठकर कलावती के पास गया और स्वर में मिठास घोलते हूए उससे पूछा, " देख रहा हूँ जब से तुम बसमतिया की अंत्येष्टि