दो मुसाफिर एक मंजिल

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"बेटा, कब तक यूं मुसाफिरों की तरह भटकता रहेगा! मैं अब भी कहती हूं लौट आ ! सब कुछ तो है, फिर क्यों मारा मारा फिरता है! अगर पता होता तू बाहर जाकर बाहर का ही होकर रह जाएगा तो तुझे नौकरी क्या पढ़ने के लिए भी ना भेजती! तरस गई हूं तुझसे जी भर बातें करने के लिए! मुझे तो लगता है, यह तेरे लिए घर नहीं मुसाफिरखाना है। जहां कुछ दिन आराम कर तू फिर लौट जाता है!"" मां प्लीज! ऐसी बातें मत करो। जितना प्यार आप मुझसे करती हो। मुझे भी आपसे उतना ही प्यार है। मुझे