कुंवारी माँ

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कुंवारी माँलेखक: विजय शर्मा एर्रीगाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठी वह अक्सर दूर तक ताकती रहती—जैसे किसी आने वाले का इंतज़ार हो। लोग उसे अनामिका कहते थे, पर उसके जीवन की सबसे बड़ी पहचान थी—बिन ब्याही माँ। यह शब्द गाँव की हवा में ऐसे घुला था कि उसके नाम से पहले ही आ जाता। कोई फुसफुसाता, कोई आँखें चुराता, और कोई सीधे सवाल दाग देता—“ब्याह कब हुआ था?”अनामिका मुस्कुरा देती। मुस्कान के पीछे दर्द था, पर आँखों में हार नहीं।उसका बेटा अंश अब आठ साल का हो चुका था—चंचल, तेज़, और माँ की तरह ही शांत साहसी। स्कूल जाते