दोपहर का वक्त था। खिड़की से आती धूप अब फर्श पर लंबी लकीरें बना रही थी। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था, जो काया को भीतर ही भीतर खाए जा रहा था। जब से काया ने उस प्रॉपर्टी डीलर और वंशिका दीदी की बातें सुनी थीं, उसका चैन छिन गया था। उसे लग रहा था कि यह घर, जिसे उसने पिछले डेढ़ साल से अपने पसीने और ममता से सींचा है, उसकी नींव डगमगा रही है।डेढ़ साल... यह समय कहने को तो कम था, लेकिन काया के लिए यह एक पूरी सदी जैसा था। इसी घर की चौखट