डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 8

सुबह की आपाधापी के बीच घर का माहौल ऊपरी तौर पर तो सामान्य दिख रहा था, लेकिन वंशिका के मन के भीतर एक गहरी उथल-पुथल मची थी। डाइनिंग टेबल पर नाश्ता लगा था। भूपेंद्र साहब अपनी फाइलें देख रहे थे और काया बच्चों के जूतों के फीते बांध रही थी। हर मिनट में "काया, ज़रा मेरा पेन देना," या "काया, विहान का दूध खत्म हो गया," की आवाज़ें गूँज रही थीं।वंशिका अपनी कॉफी का कप पकड़े चुपचाप यह सब देख रही थी। उसे लग रहा था कि वह इस घर की फ्रेम से बाहर होती जा रही है। उसे अपनी