स्वर्णा

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बारिश की बूँदें स्टेशन की पुरानी छत से टपक रही थीं। प्लेटफॉर्म पर लगी पीली लाइटें गीली ज़मीन पर अजीब सी चमक पैदा कर रही थीं। हवा में ठंडक थी, और भीड़ में भी एक अजीब सा सन्नाटा। इसी भीड़ के बीच, एक कोने में खड़ी थी स्वर्णा—भीगे हुए बाल, थकी हुई आँखें और हाथ में पकड़ा एक छोटा सा सूटकेस।वह किसी ट्रेन का इंतज़ार नहीं कर रही थी।वह अपनी ज़िंदगी से भाग रही थी । अपने अकेले पन के साथ स्वर्णा खुद को हौसला देते हुए लंबी लंबी साँसे ले रही थी। कुछ ही घंटों पहले वह अपने घर से